भीड़ तो आती है, लेकिन सीटें नहीं; इस बार बंगाल में चुनावी समीकरण बदल पाएंगे बाबरी वाले हुमायूं?

Jan 06, 2026 01:57 pm ISTAmit Kumar पीटीआई, कोलकाता
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हूगली का फुरफुरा शरीफ राजनीतिक संकेतों का एक अहम केंद्र रहा है। लेकिन वहां भी समर्थन ऐतिहासिक रूप से स्थायी नहीं रहा और चुनावी विकल्प सीमित होते ही निष्ठाएं बदलती देखी गई हैं। आखिर क्यों? समझिए

भीड़ तो आती है, लेकिन सीटें नहीं; इस बार बंगाल में चुनावी समीकरण बदल पाएंगे बाबरी वाले हुमायूं?

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर की बगावत ने एक बार फिर पश्चिम बंगाल में मुस्लिम सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों को सुर्खियों में ला दिया है। 2026 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले कबीर की नई पार्टी और बाबरी जैसी मस्जिद की नींव रखने की घोषणा ने टीएमसी के अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाने की अटकलों को जन्म दिया है। हालांकि, इतिहास गवाह है कि बंगाल में ऐसे दौर बार-बार आते हैं, लेकिन मतदान के दिन कुछ और ही गणित हावी होता है।

दशकों से बंगाल में अल्पसंख्यक मतदान पैटर्न काफी हद तक स्थिर रहा है। यह धार्मिक करिश्मे या प्रतीकात्मक दावों से कम, बल्कि संगठन, गठबंधन और वोट एकजुटता से ज्यादा प्रभावित होता है। 294 सीटों वाली विधानसभा के लिए मार्च-अप्रैल 2026 में होने वाले चुनावों में कबीर की बगावत जैसे एपिसोड टीएमसी के मजबूत अल्पसंख्यक आधार को विभाजित करने की चर्चा पैदा कर रहे हैं, जो लंबे समय से पार्टी की चुनावी ताकत रहा है।

पिछले उदाहरणों में भी ऐसे दौर हावी रहे हैं, लेकिन चुनावी नतीजों पर असर नहीं पड़ा। 2016 में मौलवी तोहा सिद्दीकी और 2021 में अब्बास सिद्दीकी जैसे धार्मिक-राजनीतिक चेहरों ने चुनावी सभाओं में भारी भीड़ जुटाई। अब्बास सिद्दीकी की इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) ने वाम और कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था, लेकिन सिर्फ एक सीट जीत पाई। मौजूदा समय में कबीर के इर्द-गिर्द बना राजनीतिक माहौल भी उसी तरह के राजनीतिक आत्म-प्रकटन की याद दिलाता है। हर ऐसे चरण में यह उम्मीद जगी कि TMC के अल्पसंख्यक समर्थन में दरार पड़ेगी और मुस्लिम राजनीति का कोई वैकल्पिक केंद्र उभरेगा। लेकिन असल में, प्रचार समाप्त होते ही यह उभार ठहर जाता रहा है।

संगठन बनाम भावनाएं

पिछले अनुभव बताते हैं कि चुनाव-पूर्व धार्मिक अधिकार या सामाजिक प्रभाव के सहारे किया गया लामबंदी का प्रयास सीटों में तब्दील नहीं हो सका। बूथ स्तर का संगठन, गठबंधन प्रबंधन और वोट ट्रांसफर की क्षमता बंगाल की राजनीति में निर्णायक रही है। राजनीतिक विश्लेषक मैदुल इस्लाम के मुताबिक- धार्मिक चेहरे भावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन वे निर्वाचन क्षेत्रों में अल्पसंख्यक वोटों का ट्रांसफर नहीं करा सकते। मतदाता अंत में यही देखते हैं कि जीत कौन सकता है और भाजपा को कौन रोक सकता है।

2021 के चुनावों से पहले अब्बास सिद्दीकी द्वारा बनाई गई इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) और उसका लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन एक बड़े ‘डिसरप्टर’ के रूप में पेश किया गया था। लेकिन नतीजों में पार्टी सिर्फ एक सीट जीत सकी। ISF के इकलौते विधायक नौशाद सिद्दीकी का कहना है- लोग रैलियों में भावना के साथ आते हैं, लेकिन वोट डर और गणना के साथ डालते हैं। अगर किसी को लगता है कि उसका वोट भाजपा को फायदा पहुंचा सकता है, तो वह पीछे हट जाता है।

फुरफुरा शरीफ से कबीर तक

हूगली का फुरफुरा शरीफ राजनीतिक संकेतों का एक अहम केंद्र रहा है। लेकिन वहां भी समर्थन ऐतिहासिक रूप से स्थायी नहीं रहा और चुनावी विकल्प सीमित होते ही निष्ठाएं बदलती देखी गई हैं। अब वही बहस कबीर के जरिए लौट आई है। TMC नेतृत्व पर ‘प्रो-हिंदू छवि’ अपनाने का आरोप, बाबरी मस्जिद की कॉपी बनाने की घोषणा और जनता उन्नयन पार्टी की शुरुआत ने प्री-पोल माहौल में नई हलचल पैदा की है। कबीर का दावा है कि वह 135 से अधिक सीटों पर लड़ने पर विचार कर रहे हैं और वाम दलों, ISF तथा AIMIM से बातचीत के दरवाजे खुले रखे हुए हैं। हालांकि CPI(M) के एक नेता का कहना है कि बिना कैडर, पोलिंग एजेंट और बूथ स्तर की मशीनरी के उत्साह मतदान तक नहीं टिकता।

ध्रुवीकरण और राजनीतिक यादाश्त

भाजपा का तर्क है कि पहचान आधारित लामबंदियां ध्रुवीकरण को तेज करती हैं और हिंदू वोटों को संगठित करती हैं, जो बहुकोणीय मुकाबलों में उसके लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। विश्लेषकों के अनुसार, ऐसी कोशिशों को तीन संरचनात्मक बाधाएं कमजोर करती हैं- राज्यव्यापी संगठन का अभाव, गैर-मुस्लिम समुदायों में स्वीकार्यता की कमी और मतदाताओं की लंबी राजनीतिक यादाश्त।

समाज शोधकर्ता सबीर अहमद कहते हैं कि बंगाल में कांग्रेस के दिग्गज ए बी ए गनी खान चौधरी के बाद कोई ऐसा मुस्लिम जननेता नहीं उभरा, जिसके पास पूरे राज्य में संगठन, प्रभाव और शासन की क्षमता हो। जब तक ऐसा नहीं होता, धार्मिक आधार पर हुई लामबंदी नाजुक ही रहेगी।

इतिहास भी यही संकेत देता है। आजादी से पहले मुस्लिम वोट कांग्रेस, कृषक प्रजा पार्टी और मुस्लिम लीग के बीच बंटा हुआ था। विभाजन के बाद मुसलमान कांग्रेस, फिर वाम मोर्चे और बाद में TMC की ओर गए- धर्म से अधिक राजनीतिक सुरक्षा की तलाश में। यही तर्क आज भी मतदाताओं के फैसलों में दिखता है। राज्य के मंत्री फिरहाद हाकिम का दावा है कि अल्पसंख्यक जानते हैं कि भाजपा को रोकने की क्षमता सिर्फ TMC के पास है।

Amit Kumar

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