क्या जानबूझकर काटे गए मुस्लिम वोट? SIR ने कैसे बदल दिया बंगाल का चुनावी नक्शा
पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 से पहले वोटर लिस्ट (SIR) से बड़ी संख्या में नाम काटे गए हैं। मुस्लिम और मतुआ बहुल इलाकों में इसका सबसे ज्यादा असर दिखा है। जानिए इससे TMC और BJP के वोट बैंक पर क्या फर्क पड़ेगा और क्या है बंगाल का पूरा चुनावी गणित।

पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) नाम की प्रक्रिया चल रही है। यह चुनावी वोटर लिस्ट यानी मतदाता सूची को साफ-सुथरा करने की एक बड़ी कवायद है। इसमें पुरानी लिस्ट की जांच होती है और गलत, मृत या दोहरे नाम वाले वोटरों को हटाया जाता है। इस बार इस प्रक्रिया में एक खास एडजुडिकेशन यानी न्यायिक निर्णय वाला स्टेप जोड़ा गया है। इसके तहत स्थानीय अधिकारी हर नाम की दोबारा जांच करते हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस SIR और एडजुडिकेशन की वजह से राज्य की मतदाता सूची में जेरिमैंडरिंग हो गया है? जेरिमैंडरिंग का मतलब होता है वोटरों की संख्या या जगह को इस तरह बदलना कि किसी खास पार्टी को फायदा हो। आसान भाषा में कहें तो- चुनावी क्षेत्रों की मनमानी सीमाबंदी।
यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि मुस्लिम बहुल इलाकों और विधानसभा क्षेत्रों में वोटर हटाने की संख्या ज्यादा थी। मुस्लिम वोटर आमतौर पर भाजपा को कम वोट देते हैं और तृणमूल कांग्रेस (TMC) या कांग्रेस को ज्यादा वोट देते हैं। इसलिए अगर मुस्लिम वोटर ज्यादा हटे तो भाजपा को फायदा हो सकता है। लेकिन क्या वाकई ऐसा हुआ है? आइए समझते हैं।
SIR से कुल वोटरों की संख्या कितनी घटी?
पहले बिहार में SIR हुआ था (अगस्त 2025)। तब हमने कहा था कि SIR से वोटरों की कुल संख्या भले ही पहले से कम हो जाए, लेकिन वह संख्या पिछले चुनाव में वास्तव में वोट डालने वाले लोगों से अभी भी ज्यादा रहेगी। SIR में जो लोग हटाए गए, वे ज्यादातर मृतक, माइग्रेट यानी अन्य जगह चले गए या दोहरी रजिस्ट्री वाले थे। इन्हें “डेडवुड” (बेकार नाम) कहते हैं। हमने कहा था कि SIR के बाद मतदान प्रतिशत बढ़ेगा। बिहार के 2025 चुनाव में ठीक यही हुआ। केरल और असम में भी SIR या स्पेशल रिवीजन के बाद टर्नआउट बढ़ा।
अब पश्चिम बंगाल की बात: बंगाल में भी अभी जो कुल वोटर लिस्ट में बचे हैं, उनकी संख्या 2024 के लोकसभा चुनाव में वोट डालने वाले लोगों की कुल संख्या से काफी ज्यादा है। यानी यह सच है कि SIR के बाद कुल मतदाताओं की संख्या में गिरावट के बावजूद यह संख्या अभी भी 2024 के लोकसभा चुनाव में पड़े कुल वोटों से अधिक है। इसका मतलब यह हुआ कि यदि आगामी विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़ता है, तो कुल वोटों की संख्या में कमी नहीं आएगी। लेकिन यहां चुनौती यह है कि 2021 के विधानसभा चुनाव में जहां मतदान प्रतिशत 81.7% था, वहीं 2026 में इसे लगभग 88.9% तक पहुंचाना होगा, जो अपने आप में एक बड़ा लक्ष्य है। कई सीटें ऐसी हैं जहां मतदाताओं और पिछले चुनाव में पड़े वोटों के बीच अंतर बहुत कम है, ऐसे में थोड़ी सी गिरावट भी कुल मतदान को प्रभावित कर सकती है।
मुस्लिम और मतुआ बहुल इलाकों पर सबसे ज्यादा असर?
हिंदुस्तान टाइम्स (HT) ने 10 अप्रैल 2026 को रिपोर्ट दी कि एडजुडिकेशन यानी दोबारा जांच के दौरान वोटर हटाने का पैटर्न पहले SIR से भी ज्यादा तिरछा था। 2011 से अब तक कम से कम एक मुस्लिम विधायक चुनने वाली 67 विधानसभा सीटों पर नाम कटने की दर सबसे ज्यादा रही है। यही ट्रेंड उन 16 सीटों पर भी देखा गया है जहां 'मतुआ समुदाय' का प्रभाव है। इनमें से 9 सीटें अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित हैं। 'मतुआ समुदाय' बांग्लादेश से आए दलित समूहों का संगठन है। तीन सीटें ऐसी हैं जहां 2026 के कुल वोटर 2024 के मुकाबले कम हो गए हैं। ये हैं- दक्षिण 24 परगना की मेटियाबुरुज (TMC का गढ़) और मुर्शिदाबाद की लालगोला और शमशेरगंज (कांग्रेस का गढ़)।
यह रुझान इस बात की ओर इशारा करता है कि कुछ विशेष सामाजिक समूहों वाले इलाकों में मतदाता सूची का संशोधन समान रूप से नहीं हुआ। हालांकि, इन क्षेत्रों में अन्य समुदायों के मतदाता भी मौजूद हैं, इसलिए इसे पूरी तरह एकतरफा कहना भी सरल नहीं है।
आगे क्या हो सकता है? (वोटिंग प्रतिशत का दबाव)
96 क्षेत्र ऐसे हैं जहां 2026 के मतदाता और 2024 के वोटरों के बीच फर्क सिर्फ 10% से कम है। मतलब, अगर टर्नआउट नहीं बढ़ा तो 2026 में इन सीटों पर कुल वोट कम पड़ सकते हैं। 121 क्षेत्रों में टर्नआउट 90% से ऊपर होना पड़ेगा ताकि 2026 में वोटों की संख्या 2024 से कम न हो। इनमें से 29 मुस्लिम बहुल और 15 मतुआ बहुल हैं।
जेरिमैंडरिंग- क्या जानबूझकर नाम काटे गए?
इस पूरे मुद्दे को जेरिमैंडरिंग यानी चुनावी हेरफेर के रूप में देखना अभी जल्दबाजी माना जा रहा है, क्योंकि धर्म या समुदाय के आधार पर मतदाता सूची का पूरा और स्पष्ट डेटा उपलब्ध नहीं है। इसलिए जो भी निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं, वे संभावनाओं और रुझानों पर आधारित हैं, न कि ठोस प्रमाणों पर। एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि हटाए गए नामों में वे लोग शामिल हो सकते हैं जो या तो अब जीवित नहीं हैं, स्थानांतरित हो चुके हैं या एक से अधिक जगहों पर पंजीकृत थे, यानी मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाने की प्रक्रिया के तहत यह बदलाव हुआ है।
दिलचस्प बात यह भी सामने आई है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत कम था, जबकि मतुआ प्रभाव वाले क्षेत्रों में यह अधिक रहा। इससे दो तरह की व्याख्याएं निकलती हैं- एक, यह कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मतदाता सूची में ‘डेडवुड’ यानी गैर-प्रभावी नाम अधिक हो सकते थे; दूसरा, यह कि वहां मतदाताओं में मतदान के प्रति उत्साह अपेक्षाकृत कम था। अब जब इन क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक नाम हटे हैं, तो यह भी संभव है कि आगामी चुनाव में इन समुदायों के मतदाता ज्यादा सक्रिय होकर मतदान करें।
कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल में SIR और एडजुडिकेशन की प्रक्रिया ने चुनावी परिदृश्य को जटिल बना दिया है। फिलहाल उपलब्ध आंकड़े कुछ संकेत जरूर देते हैं, लेकिन अंतिम निष्कर्ष चुनाव के बाद ही सामने आएंगे, जब सीटवार मतदान और परिणामों का विस्तृत विश्लेषण किया जाएगा। अभी के लिए यह कहना ज्यादा उचित होगा कि इस प्रक्रिया ने सवाल जरूर खड़े किए हैं, लेकिन इसे सीधे तौर पर चुनावी हेरफेर करार देना अभी तथ्यों के आधार पर संभव नहीं है।
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अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।
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