सूखे से सैलाब तक का खतरनाक ट्रेंड: क्यों हिमालयी राज्यों में बढ़ रही तबाही, एक्सपर्ट्स को किस बात का डर
इस वर्ष जून में अधिकांश हिमालयी राज्यों में सूखे जैसे हालात रहे। हालांकि जुलाई की शुरुआत में मॉनसून ने जोरदार वापसी की है। एक्सपर्ट्स ने चिंता जताई है कि यह हिमालयी राज्यों में सूखे से सैलाब का खतरनाक ट्रेंड है।

Extreme Weather in Himalayan States: हिमालयी राज्यों में मॉनसून का मिजाज तेजी से बदल रहा है और यह बदलाव अब खतरनाक रूप लेता दिख रहा है। कभी सामान्य से कम बारिश तो कभी अचानक सैलाब- यह अस्थिरता पिछले कुछ वर्षों में साफ तौर पर बढ़ी है। विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग, अल-नीनो प्रभाव और पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ता मानवीय दबाव वर्षा के पारंपरिक पैटर्न को तोड़ रहा है, जिससे आपदाऔं का जोखिम बढ़ गया है। कुछ हिमालयी राज्यों के पिछले वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि कम समय में अत्यधिक बारिश (एक्ट्रीम रेनफॉल) की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। इसका सीधा असर खेती-बागवानी, सड़क नेटवर्क, स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी ढांचों पर पड़ रहा है।
जून सूखा, जुलाई में धमाकेदार एंट्री
इस वर्ष जून में अधिकांश हिमालयी राज्यों में सूखे जैसे हालात रहे। उत्तराखंड में 37 फीसदी, हिमाचल में 35 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई। हालांकि जुलाई की शुरुआत में मॉनसून ने जोरदार वापसी की है। उत्तराखंड में दो दिनों में सामान्य से 97 फीसदी अधिक (42.7 मिमी) और हिमाचल में 211 प्रतिशत से अधिक (27.4 मिमी) बारिश दर्ज की गई। अन्य राज्यों में भी सामान्य से अधिक या बराबर वर्षा रिकॉर्ड हुई है।
जम्मू-कश्मीर स्थिर
जम्मू-कश्मीर में बारिश अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई है और उतार-चढ़ाव कम है। सिक्किम में लगातार अच्छी बारिश के कारण नदियां उफान पर हैं और फ्लैश फ्लड का खतरा बढ़ा है। वहीं, अरुणाचल प्रदेश में वर्षा लगातार घटी है।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स
देहरादून में मौसम निदेशक ड़. सीएस तोमर का कहना है कि मॉनसून सिस्टम स्थिर नहीं रहते, जिससे अलग-अलग क्षेत्रों में वर्षा का वितरण बदलता रहता है। इसे 'इंटरसीजनल वेरिएबिलिटी' कहा जाता है। मौसम विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक रोहित थपलियाल कहते हैं कि जुलाई-अगस्त में अधिक बारिश होना सामान्य है, लेकिन कम समय में अत्यधिक बारिश आपदा का कारण बन रही है।
हिमाचल: सूखे से सैलाब तक खतरनाक ट्रेंड
हिमाचल प्रदेश में मॉनसून की अनिश्चितता सबसे अधिक देखी जा रही है। एक साल सूखा तो अगले ही साल बाढ़ जैसे हालात बन जाते हैं। 2024 में राज्य में 18 प्रतिशत कम बारिश दर्ज हुई। जबकि 2025 में यह सामान्य से 39 प्रतिशत अधिक हो गई। यह सूखे से सैलाब का खतरनाक ट्रेंड है।
उत्तराखंडः कम दिनों में ज्यादा बारिश का खतरा
उत्तराखंड में कुल मॉनसूनी बारिश का आंकड़ा लगभग स्थिर बना हुआ है। लेकिन बारिश का स्वरूप बदला है। चार महीनों में फैलने वाली बारिश अब जुलाई-अगस्त के कुछ ही दिनों में सिमट रही है। यही वजह है कि भूस्खलन, फ्लैश फ्लड और अन्य आपदाओं की घटनाएं बढ़ रही हैं।
पिछले पांच वर्षों के रिकॉर्ड
पिछले पांच वर्षों की बात करें तो उत्तराखंड में मॉनसूनी बारिश का रुझान उतार-चढ़ाव वाला रहा है। वर्ष 2021 में सामान्य से 2% कम बारिश दर्ज हुई, जबकि 2022 में यह 5% अधिक और 2023 में 18% अधिक रही। इसके बाद 2024 में मानसून सामान्य से 12% कम रहा, लेकिन 2025 में फिर से सुधार हुआ और सामान्य से 15% अधिक बारिश दर्ज की गई। तुलना करें तो 2025 में हिमाचल प्रदेश में सबसे अधिक 39% अतिरिक्त बारिश हुई, जबकि जम्मू में 8%, सिक्किम में 12% और अरुणाचल प्रदेश में सामान्य से 10% कम बारिश दर्ज की गई।
मानसून में सतर्कता से करें केदारनाथ की यात्रा:डीएम
रुद्रप्रयाग। जिलाधिकारी विशाल मिश्रा ने श्रद्धालुओं से मानसून के दौरान पूरी सतर्कता के साथ केदारनाथ धाम यात्रा करने और प्रशासन की ओर से जारी दिशा-निर्देशों का पालन करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि वर्षा और ग्रीष्मकालीन अवकाश समाप्त होने के कारण यात्रियों की संख्या में कमी आई है, किंतु यात्रा पूरी तरह सुचारु रूप से संचालित हो रही है।
जिलाधिकारी ने यात्रियों से यात्रा से पहले स्वास्थ्य परीक्षण कराने, रेनकोट, छाता और गर्म कपड़े साथ रखने तथा भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि सुरक्षा कारणों से यदि प्रशासन यात्रा रोकने या किसी स्थान पर प्रतीक्षा करने के निर्देश देता है तो उनका धैर्यपूर्वक पालन करें। साथ ही अफवाहों से बचते हुए केवल प्रशासन की सूचनाओं पर ही भरोसा करें।
नदियों के जलस्तर पर 24 घंटे निगरानी
रुद्रप्रयाग। मानसून के दौरान जनसुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए जिला प्रशासन पूरी तरह अलर्ट मोड पर है। जिलाधिकारी विशाल मिश्रा ने बताया कि जनपद की सभी प्रमुख नदियों, गाड़-गदेरों के जलस्तर और वर्षा की मात्रा की प्रतिदिन निगरानी की जा रही है तथा जोखिम वाले क्षेत्रों पर नजर रखी जा रही है।
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