Explainer: 'गॉडजिला अल नीनो क्या है? जो आ रहा भारत की ओर; खेतीबारी से लेकर पावरग्रिड तक सब चौपट होने का महाखतरा क्यों

लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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What is Godzilla El Nino: वैज्ञानिकों के मुताबिक, जब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक (लगभग 2.5°C या उससे ज्यादा) बढ़ जाता है, तो पूरी दुनिया के मौसम, हवाओं और बारिश का चक्र प्रभावित होता है।

'गॉडजिला अल नीनो क्या है? जो आ रहा भारत की ओर; खेतीबारी से लेकर पावरग्रिड तक सब चौपट होने का महाखतरा क्यों

What is Godzilla El Nino Monsoon 2026: देश में भले ही दक्षिण-पश्चिम मॉनसून ने एक हफ्ते पहले ही दस्तक दे दी हो लेकिन इस बार मॉनसून से कम बारिश दर्ज की जा रही है। मॉनसून का पहला हफ्ता निराशाजनक रहा है क्योंकि अब तक 12 फीसदी कम बारिश रिकॉर्ड की गई है। इतना ही नहीं, भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने कहा है कि इस साल सामान्य से कम बारिश होने के संकेत हैं। IMD ने मॉनसून से के लंबे समय के औसत का लगभग 90 प्रतिशत बारिश होने का ही अनुमान लगाया है। इसके साथ ही अधिकारियों ने यह चेतावनी भी दी है कि मॉनसून के दूसरे हिस्से में अल-नीनो की स्थिति गंभीर हो सकती है। इससे फसलों को होने वाला खतरा बढ़ सकता है।

इन सबके बीच अंतरराष्ट्रीय मौसम वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट इमैजरी, मॉड्यूल्स और समुद्री जल के ताप और उसके पैटर्न के आधार पर भविष्यवाणी की है कि हजारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर में गर्म हो रहे पानी का एक विशाल हिस्सा (जल राशि) जल्द ही भारत की तरफ बढ़ सकता है और पूरे भारत में रोजमर्रा की जिंदगी को तबाह कर सकता है। इसमें खेतीबारी से लेकर सिंचाई के स्रोत और पावर ग्रिड भी नष्ट हो सकते हैं।

क्या है 'गॉडज़िला अल नीनो

प्रशांत महासागर में हजारों किलोमीटर दूर पानी के उस गर्म जलधारा को वैज्ञानिकों ने 'गॉडज़िला अल नीनो' या 'सुपर अल नीनो' कहा है, जो भारत के लिए खतरे की घंटी बजा रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह अब तक के इतिहास का सबसे शक्तिशाली अल नीनो साबित हो सकता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, जब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक (लगभग 2.5°C या उससे ज्यादा) बढ़ जाता है, तो पूरी दुनिया के मौसम, हवाओं और बारिश का चक्र प्रभावित होता है।

यह एक प्राकृतिक मौसम पैटर्न है

वैज्ञानिक 'अल नीनो' के बनने पर नजर रख रहे हैं। यह एक प्राकृतिक मौसम पैटर्न है जो दुनिया भर में मौसम को बदल सकता है। हालांकि यह उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में शुरू होता है, लेकिन इसका असर अक्सर दक्षिण-पश्चिम मॉनसून में बदलाव के ज़रिए भारत तक पहुँचता है। मॉनसून भारत में बारिश लाने वाला सालाना मौसमी दशा है जो बारिश करता है, जिससे खेतों, जलाशयों में पानी भरता है और उसका इस्तेमाल खेती से लेकर उद्योग धंधों तक होता है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) समेत दुनिया की कई संस्थाओं ने चेतावनी दी है कि उभरता हुआ अल नीनो सिर्फ़ मौसम की एक घटना से कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकता है। इसका असर खेती, ऊर्जा, ट्रांसपोर्ट और खाने-पीने की व्यवस्था पर एक साथ पड़ सकता है।

'गॉडजिला अल नीनो' कैसे बनता है?

जब भूमध्य रेखा के पास मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र का पानी सामान्य से बहुत ज्यादा गर्म हो जाता है, तो हवाओं का रुख बदल जाता है और अल नीनो बनता है। 'गॉडजिला' नाम का इस्तेमाल केवल तब किया जाता है जब यह घटना असाधारण रूप से मजबूत, प्रचंड और विनाशकारी हो जाती है। यह कोई आधिकारिक वैज्ञानिक वर्गीकरण नहीं है, बल्कि एक लोकप्रिय उपनाम है।

मॉनसून और खेती पर अल नीनो का असर

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह प्राकृतिक जलवायु पैटर्न भारत के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून को कमजोर कर सकता है। मॉनसून भारत की खेती, जलाशयों और जल आपूर्ति की जीवनरेखा है। अगर बारिश कम होती है, तो इसका सीधा असर खेतों की सिंचाई और फसलों की पैदावार पर पड़ेगा। इस 'गॉडज़िला' अल नीनो का असर सिर्फ खेतों तक ही सीमित नहीं रहेगा। कम बारिश के कारण नदियों और जलाशयों में पानी का स्तर गिर सकता है, जिससे पीने के पानी की भारी कमी हो सकती है। साथ ही, पानी कम होने से पनबिजली (हाइड्रोपावर) उत्पादन भी प्रभावित होगा।

पावर ग्रिड पर दोहरी मार

एक तरफ बिजली का उत्पादन कम होगा, तो दूसरी तरफ भीषण गर्मी के कारण पंखों, एयर कंडीशनर और रेफ्रिजरेशन की मांग आसमान छू लेगी। इससे देश के पावर ग्रिड पर भारी दबाव पड़ेगा, जो पहले से ही गर्मियों की लू (Heatwaves) के कारण अतिरिक्त बोझ उठा रहे हैं। भारत में पिछले ही महीने बिजली की मांग का अब तक का सबसे ज़्यादा स्तर लगभग 265 गीगावाट (GW) दर्ज किया गया था। बता दें कि भारत में पिछले साल जून 2025 में बिजली की अधिकतम मांग 242.77 GW दर्ज की गई थी, जबकि मई 2024 में मांग 250 GW तक पहुँच गई थी, जो उस समय सबसे ज़्यादा थी लेकिन इस साल मई में रिकॉर्ड 265 गीगावाट तक पहुंच गई। ग्लोबल एक्सपर्ट्स ने इंटरनेशनल शिपिंग और सप्लाई चेन के लिए भी खतरों की ओर इशारा किया है।

दूसरे देशों में क्या असर?

कुछ सालों के अंतराल पर आने वाले अल नीनो की वजह से पहले भी मध्य अमेरिका के कुछ हिस्सों में सूखे जैसे हालात बने हैं, जिससे पनामा नहर (एक अहम ट्रेड रूट) पर ट्रैफिक प्रभावित हुआ है। ग्लोबल शिपिंग में किसी भी तरह की रुकावट से दुनिया भर में सामान और कमोडिटी की आवाजाही पर परोक्ष रूप से असर पड़ सकता है। इसके अलावा पेरू और इक्वाडोर जैसे समुद्री देशों के तटीय इलाकों में समुद्र का पानी गर्म होने से अत्यधिक भारी बारिश होती है। इसके कारण भयानक बाढ़ और भूस्खलन आते हैं, जिससे बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान होता है। वहीं ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में अल नीनो की वजह से गंभीर सूखा और आग लगने की घटनाओं में बढ़ोत्तरी देखी गई है। अफ्रीका में तो यह अकाल और भुखमरी तक लेकर आती रही है।

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Pramod Praveen

लेखक के बारे में

Pramod Praveen

प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।

अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।

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