कैसे होगा 5 राज्यों में मतदान, परेशानियां बढ़ाएगा तापमान; चुनाव पर मौसम का भारी असर
मौसम विभाग के अनुसार, असम में मतदान से पहले गरज-चमक और बारिश की संभावना है, जबकि तमिलनाडु और केरल में ‘वेट-बल्ब’ जैसी स्थिति बन रही है, जिसमें शरीर ठंडा नहीं हो पाता और हीट स्ट्रेस जानलेवा हो सकता है।

देश में चुनावी प्रक्रिया भी जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रही है। बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश और बदलते मौसम से मतदान प्रभावित होने लगे हैं। गर्मी की स्थिति तय कर रही है कि कौन वोट देने आएगा, और कौन बीच रास्ते से ही लौट जाएगा।
‘क्लाइमेट ट्रेंड्स’ के विश्लेषण के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन चुनावी प्रक्रिया के सामने गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। अप्रैल में पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में हो रहे चुनावों में 17.4 करोड़ मतदाता और दो लाख से अधिक मतदान केंद्र शामिल हैं, लेकिन मौसम की अनिश्चितता इस पूरी प्रक्रिया को प्रभावित कर रही है।
हाल के वर्षों में अप्रैल का तापमान लगातार बढ़ा है। वर्ष 2022 में यह सामान्य से 1.36 डिग्री अधिक रहा, जबकि 2025 में भी यह अंतर 0.86 डिग्री दर्ज किया गया। इसका असर यह है कि दोपहर में मतदान करना अब सिर्फ असुविधाजनक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से जोखिम भरा हो गया है। वहीं, वर्षा का पैटर्न भी असंतुलित हो गया है-कहीं कमी तो कहीं अत्यधिक बारिश।
कैसा रहेगा मौसम
मौसम विभाग के अनुसार, असम में मतदान से पहले गरज-चमक और बारिश की संभावना है, जबकि तमिलनाडु और केरल में ‘वेट-बल्ब’ जैसी स्थिति बन रही है, जिसमें शरीर ठंडा नहीं हो पाता और हीट स्ट्रेस जानलेवा हो सकता है। स्काईमेट वेदर के महेश पालावत के मुताबिक, बढ़ते तापमान ने प्री-मॉनसून गतिविधियों को पहले और अधिक तीव्र बना दिया है।
मौसम की मार
आंकड़े भी खतरे की पुष्टि करते हैं। वर्ष 2024-25 में प्राकृतिक आपदाओं से केरल में 387, असम में 128 और तमिलनाडु में 120 लोगों की मौत हुई। वहीं, वर्ष 2017 से 2022 के बीच हर साल बिजली गिरने से दो हजार से अधिक मौतें दर्ज की गईं।
आईआईटीएम के जलवायु वैज्ञानिक रॉक्सी मैथ्यू कोल के अनुसार, हिंद महासागर के बढ़ते तापमान ने मौसम के पारंपरिक पैटर्न को बदल दिया है, जिससे पूर्वानुमान कठिन हो गया है। इस बदलती स्थिति में निर्वाचन आयोग के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
आयोग ने राहत के लिए ये पहल की
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत के अनुसार आयोग ने मतदान का समय सुबह से शाम तक बढ़ाने, कतार ट्रैकिंग और दिव्यांगों के लिए घर से मतदान जैसी सुविधाएं शुरू की हैं। हालांकि, उन्होंने मौसम विभाग और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के साथ रियल-टाइम समन्वय की कमी को बड़ी चुनौती बताया।
विशेषज्ञ बोले, ये उपाय करने होंगे
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चुनावी कैलेंडर को ठंडे महीनों में स्थानांतरित किया जाए और पर्यावरण-अनुकूल उपाय अपनाए जाएं, तो जलवायु जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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लेखक के बारे में
Nisarg Dixitनिसर्ग दीक्षित न्यूजरूम में करीब एक दशक का अनुभव लिए निसर्ग दीक्षित शोर से ज़्यादा सार पर भरोसा करते हैं। पिछले 4 साल से वह लाइव हिनुस्तान में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं, जहां खबरों की योजना, लेखन, सत्यापन और प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं। इससे पहले दैनिक भास्कर और न्यूज़18 जैसे बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक की भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की, जिसने उनके काम करने के तरीके को व्यावहारिक और तथ्य आधारित बनाया। निसर्ग की खास रुचि खोजी रिपोर्टिंग, ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ स्टोरीज़ में है। वे जटिल मुद्दों को सरल भाषा और स्पष्ट तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं। राजनीति और जांच पड़ताल से जुड़े विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ है। निसर्ग लोकसभा चुनावों, कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अहम घटनाओं को कवर कर चुके हैं। साथ ही संसदीय कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों को नियमित रूप से कवर करते हैं। गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी निसर्ग योगदान देते हैं।
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