इंडियन प्वाइंट न्यूक्लियर प्लांट ने हडसन नदी में 60 सालों तक छोड़ा रेडिएक्टिव पानी, करोड़ों मछलियां मरी
अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर स्थित इंडियन प्वाइंट न्यूक्लियर प्लांट की शुरुआत 16 सितंबर 1962 को हुई थी। 1970 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक यह प्लांट हर साल करीब दो से तीन मिलियन गैलन संसाधित अपशिष्ट जल छोड़ता था। यह पानी पूरी तरह से रेडियोधर्मी अपशिष्ट ही था।

न्यूक्लियर पावर प्लांट आधुनिक युग में मनुष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने का एक बड़ा साधन है। ईरान में जारी युद्ध भी इसी न्यूक्लियर इनरिचमेंट को लेकर हो रहा है। ईरान का कहना है कि वह ऊर्जा जरूरतों के लिए न्यूक्लियर इनरिचमेंट कर रहा है, तो वहीं अमेरिका का आरोप है कि ईरान इसके बहाने परमाणु बम बनाने की कोशिश कर रहा है। इससे इतर अमेरिका में एक परमाणु संयंत्र को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। एक रिपोर्ट के अनुसार, न्यूयॉर्क स्थित इंडियन पॉइंट परमाणु संयंत्र ने 60 से अधिक वर्षों तक लाखों गैलन रेडियोधर्मी जल हडसन नदी में छोड़ा। इसकी वजह से करोड़ों की संख्या में मछलियों ने अपनी जान गंवाई है।
रिपोर्ट के मुताबिक इंडियन प्वाइंट न्यूक्लियर प्लांट की शुरुआत 16 सितंबर 1962 को हुई थी। 1970 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक यह प्लांट हर साल करीब दो से तीन मिलियन गैलन संसाधित अपशिष्ट जल छोड़ता था। यह पानी पूरी तरह से रेडियोधर्मी अपशिष्ट ही था। हालांकि, इस बात की पुष्टि की गई है कि प्लांट इसका उपचार करने की कोशिश करता था। बाद में विरोध की वजह से 30 अप्रैल 2021 को इस प्लांट को बंद कर दिया गया।
न्यूक्लियर प्लांट में फंस कर मरी लाखों मछलियां
किसी भी न्यूक्लियर प्लांट को ठंडा करने के लिए पानी का इस्तेमाल किया जाता है। इसी वजह से ज्यादातर प्लांट्स को पानी के बड़े स्त्रोतों के किनारे बनाया जाता है। नई रिपोर्ट के मुताबिक, इस संयंत्र की शीतलन प्रक्रिया की वजह से लाखों की संख्या में मछलियों की मौत हो गई। नदी से शीतलन जल खींचने के लिए उपयोग किए जाने वाले इनटेक स्क्रीन मछलियों को खींचकर फंसा लेते थे, जिसके कारण 1962 से 1970 के बीच अनुमानित 15 लाख से 50 लाख मछलियाँ मर गईं। रिपोर्ट में कहा गया है कि समस्या तब और बढ़ गई जब मछलियाँ संरचना के पास शरण लेने लगीं।
न्यूक्लियर प्लांट के वर्तमान मालिक ने स्वीकारा
इस संयंत्र के वर्तमान मालिक होल्टेक इंटरनेशनल ने अपने एक बयान में इस बात को स्वीकार किया है कि संयंत्र से निकलने वाला अपशिष्ट जल कई दशकों से छोड़ा जा रहा था। यह तब हुआ जब पिछले साल एक अदालत ने बंद पड़े संयंत्र से प्रति वर्ष अतिरिक्त 45,000 गैलन रेडियोधर्मी पानी छोड़ने की योजना को मंजूरी दी थी। होल्टेक ने संयंत्र के बंद होने के बाद उसे खरीदा था और अब वह इसके डीकमीशनिंग के लिए जिम्मेदार है, जिसमें संग्रहित अपशिष्ट जल और प्रयुक्त परमाणु ईंधन का प्रबंधन शामिल है। होल्टेक ने अपना बचाव करते हुए कहा कि इस प्लांट का मालिकाना हक लेने के बाद उसने सभी उत्सर्जन निर्धारित सीमा के भीतर ही किए हैं। लेकिन इन 60 सालों के दौरान हडसन नदी का पानी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इसके अलावा आसपास के लोगों को भी नुकसान हुआ है। जलीय जीवन भी प्रभावित हुआ।
लेखक के बारे में
Upendra Thapakउपेंद्र ने डिजिटल पत्रकारिता की शुरुआत लाइव हिन्दुस्तान से की है। पिछले एक साल से वे होम टीम में कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर कार्यरत हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव 2024, ऑपरेशन सिंदूर और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की कवरेज की है। पत्रकारिता की पढ़ाई भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली (बैच 2023-24) से पूरी करने वाले उपेंद्र को इतिहास, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, राजनीति, खेल, विज्ञान और समसामयिक घटनाओं से जुड़े विषयों में गहरी रुचि है। स्नातक स्तर पर बायोटेक्नोलॉजी की पढ़ाई करने के कारण उन्हें मेडिकल और वैज्ञानिक विषयों की भाषा की भी अच्छी समझ है। वे मूल रूप से मध्यप्रदेश के भिंड जिले के निवासी हैं।
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