चिंपैंजियों के बीच छिड़ा गृह युद्ध, जानी दुश्मन बन गए साथी; 28 से ज्यादा की मौत

Upendra Thapak लाइव हिन्दुस्तान
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चिंपाजियों का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों ने बताया कि इनके बीच में 2018 के बाद से स्थिति लगातार खराब हो रही है। एक समय पर करीब 200 से ज्यादा चिंपांजियों का यह एक बड़ा समूह था, लेकिन धीरे-धीरे यह आपस में बंटते गए और इनके बीच के मतभेद बढ़ गए। इसके बाद इनके बीच का संघर्ष खूनी हो गया।

चिंपैंजियों के बीच छिड़ा गृह युद्ध, जानी दुश्मन बन गए साथी; 28 से ज्यादा की मौत

हॉलीवुड फिल्म सीरीज 'प्लेनेट ऑफ द ऐप्स' में समझदार होते चिंपांजी अपना समूह बना मनुष्यों के खिलाफ संघर्ष छेड़ देते हैं। बाद में चिंपाजियों के बीच में विभेद हो जाता है, और दो समूह आपस में ही उलझ जाते हैं। हॉलीवुड ने भले ही इस तर्ज पर एक कहानी बनाई है, लेकिन अब यह केवल एक कहानी नहीं रह गई है। युगांडा के किंबाले राष्ट्रीय उद्यान में चिंपांजियों के एक बड़े गुट में ऐसा विभेद उत्पन्न हुआ कि अब इन दोनों समूहों के बीच में खूनी संघर्ष चल रहा है। यह संघर्ष इतना खतरनाक हो चुका है कि अभी तक 20 से ज्यादा चिंपांजी इसमें मारे जा चुके हैं और कई लापता हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक इन चिंपाजियों का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों ने बताया कि इनके बीच में 2018 के बाद से स्थिति लगातार खराब हो रही है। एक समय पर करीब 200 से ज्यादा चिंपांजियों का यह एक बड़ा समूह था, लेकिन धीरे-धीरे यह आपस में बंटते गए और इनके बीच के मतभेद बढ़ गए। इसके बाद इनके बीच का संघर्ष खूनी हो गया। 2018 से लेकर अब तक करीब 28 चिंपांजी लड़ाई में मारे जा चुके हैं, जबकि कई लापता भी हैं।

घात लगाकर दूसरे समूह पर करते हैं हमला

नेशनल ज्योग्राफिक की रिपोर्ट के मुताबिक, किंबाले राष्ट्रीय उद्यान में काम करने वाले लोगों ने इन चिपांजियों के समूहों को पहचान के आधार पर नाम दिया है। पश्चिमी क्षेत्र में रहने वाले समूह के लोग ज्यादा खतरनाक हैं। यह समूह एक सुनियोजित तरीके से मध्य क्षेत्र में रहने वाले समूह पर हमला करता है। इस समूह में शामिल चिंपांजी चुपचाप कतारों में चलते हैं और क्षेत्र की सीमाओं के पास और "मध्य" समूह के चिंपैंजी की तलाश करते हैं, जैसे ही उन्हें कोई मिलता है, वह उसे पीटने लगते हैं। इसका असर यह है कि मध्य समूह के चिपांजियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। और पश्चिमी समूह ज्यादा जगह पर कब्जा करता जा रहा है।

गृहयुद्ध की क्या है वजह?

इन चिंपांजियों के ऊपर काम करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि यह सभी चिंपांजी कभी एक ही समूह का हिस्सा थे। वे साथ रहते थे, भोजन साझा करते थे और एक-दूसरे की देखभाल करते हुए समय बिताते थे। समय के साथ, उनका यह बंधन कमजोर होने लगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस अलगाव का कोई एक कारण नहीं था। बल्कि, परिस्थितियाँ धीरे-धीरे बदलती गईं।

एक घटना ने बदल दिया पूरा खेल

वैज्ञानिकों के मुताबिक कभी शांति के साथ रहने वाला यह समूह 2019 की एक घटना के बाद धीरे-धीरे खूनी संघर्ष में डूबने लगा। इस घटना में बेसी नामक एक चिंपांजी पर उसके साथ रहने वाले चिंपांजियों ने ही हमला कर दिया। उसे बुरी तरह से पीट-पीटकर मार डाला गया। हमले के बाद भी, उसका एक करीबी साथी उसके साथ रहा, उसे चलने में मदद करने की कोशिश की और मरते समय भी उसके पास से नहीं हटा। इसी घटना के बाद से समूह में अलगाव की स्थिति पैदा हो गई। कुछ बूढ़े चिंपांजियों ने स्थिति को संभालते हुए समूह को एक रखने की कोशिश की लेकिन धीरे-धीरे उनके मरने के बाद स्थिति गंभीर होती गई। उनकी मृत्यु से समूह की स्थिरता कम हो गई। लगभग उसी समय, एक नए नर चिंपैंजी ने कमान संभाली, जिससे संभवतः तनाव और बढ़ गया।

2014 और 2017 में बीमारियों के प्रकोप के बाद स्थिति और बिगड़ गई, जिनमें कई चिंपैंजी मारे गए। हिंसा शुरू होने से पहले ही वैज्ञानिकों ने देखा था कि चिंपैंजी पहले की तरह आपस में मेलजोल नहीं कर रहे थे। वे एक साथ संवारने या खाने में कम समय बिताते थे। धीरे-धीरे, छोटे-छोटे समूह बनने लगे और वे एक-दूसरे से दूर रहने लगे।

जैसे-जैसे यह दूरी बढ़ती गई, उनके बीच का जुड़ाव कमजोर होता गया। जब उन्हें लगा कि वे अब एक समूह नहीं हैं, तो झगड़े आम होने लगे। जब तक यह विभाजन पूरा हुआ, तब तक संघर्ष ने अपना रूप ले लिया था, जिससे पूर्व साथी प्रतिद्वंद्वी बन गए थे।

Upendra Thapak

लेखक के बारे में

Upendra Thapak

उपेंद्र ने डिजिटल पत्रकारिता की शुरुआत लाइव हिन्दुस्तान से की है। पिछले एक साल से वे होम टीम में कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर कार्यरत हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव 2024, ऑपरेशन सिंदूर और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की कवरेज की है। पत्रकारिता की पढ़ाई भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली (बैच 2023-24) से पूरी करने वाले उपेंद्र को इतिहास, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, राजनीति, खेल, विज्ञान और समसामयिक घटनाओं से जुड़े विषयों में गहरी रुचि है। स्नातक स्तर पर बायोटेक्नोलॉजी की पढ़ाई करने के कारण उन्हें मेडिकल और वैज्ञानिक विषयों की भाषा की भी अच्छी समझ है। वे मूल रूप से मध्यप्रदेश के भिंड जिले के निवासी हैं।

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