Explainer: निहंग कौन हैं: सिखों की 300 साल पुरानी योद्धा परंपरा, आज बार-बार विवादों में क्यों आती हैं?

लाइव हिन्दुस्तान, रुद्रप्रयाग
Follow us on Google News
share

उत्तराखंड के नागरसू गुरुद्वारे में निहंग सिखों और प्रशासन के बीच गतिरोध के बाद यह समुदाय फिर चर्चा में है। आखिर निहंग कौन हैं? उनकी 300 साल पुरानी योद्धा परंपरा क्या है? अफगानों से लड़ाई में उनकी क्या भूमिका रही और हाल के वर्षों में उनका नाम बार-बार विवादों से क्यों जुड़ रहा है…

निहंग कौन हैं: सिखों की 300 साल पुरानी योद्धा परंपरा, आज बार-बार विवादों में क्यों आती हैं?

Who Are Nihang Sikhs: उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के नागरसू गुरुद्वारे में निहंग सिखों और प्रशासन के बीच गतिरोध एक बार फिर इस समुदाय को सुर्खियों में ले आया है। भालों और तलवारों से लैस निहंग अपने चार साथियों की रिहाई की मांग पर अड़े रहे। हालात ऐसे बने कि पुलिस और ITBP के साथ सेना को भी एहतियातन तैनात करना पड़ा। इससे पहले 2021 में सिंघु बॉर्डर पर लखबीर सिंह की हत्या और 2020 में पंजाब के पटियाला में पुलिसकर्मी पर तलवार से हमले जैसी घटनाओं में भी निहंगों का नाम सामने आया था।

जब भी ऐसी कोई घटना सामने आती है, एक सवाल फिर उठ खड़ा होता है- ‘आखिर निहंग कौन हैं?’ क्या वे सिर्फ हथियार लेकर चलने वाले सिख हैं, या उनकी पहचान इससे कहीं बड़ी और पुरानी है? दरअसल, निहंगों का इतिहास करीब 300 साल पुराना है।

कभी यही योद्धा मुगलों और अफगान के अत्याचारों के खिलाफ सिखों की रक्षा की पहली पंक्ति में खड़े थे। लेकिन आज यही समुदाय अक्सर हिंसा और विवादों की खबरों के कारण सुर्खियों में आ जाता है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि निहंगों की असल पहचान क्या है और क्यों बार-बार उनका नाम विवादों से जुड़ जाता है।

कौन हैं निहंग सिख?

निहंग सिखों का एक पारंपरिक योद्धा संप्रदाय है। 1699 में दसवें सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा स्थापित खालसा पंथ से जोड़ी जाती है। इन्हें अक्सर ‘गुरु दी लाडली फौज’ यानी गुरु की चहेती सेना भी कहा जाता है। सिख परंपरा में उनका स्थान केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सैन्य और सांस्कृतिक भी रहा है।

'निहंग' शब्द के कई मायने हैं- निडर, निर्भीक और मृत्यु से बेखौफ व्यक्ति। इस कारण यह केवल एक उपाधि नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन भी होता है। यानी एक ऐसा योद्धा जो हर वक्त संघर्ष के लिए तैयार रहे और सांसारिक मोह-माया से दूर रहे।

आखिर इन्हें पहचानेंगे कैसे?

क्या आपने कभी नीले चोले, भारी-भरकम नीली पगड़ी पहने और पारंपरिक हथियारों से लैस सिखों को देखा है? अगर हां, तो बहुत संभव है कि वे निहंग हों। निहंगों की सबसे अलग पहचान उनकी वेशभूषा है-

  • वे गहरे नीले रंग का चोला पहनते हैं।
  • ऊंची, गोलाकार और बड़ी सी पगड़ी बांधते हैं।
  • पगड़ी पर पर स्टील के चक्र (चक्रम), खालसा के प्रतीक और लोहे के आभूषण लगे होते हैं।
  • इनके पास तलवार, कृपाण, भाला, कटार जैसे पारंपरिक हथियारों के साथ आधुनिक हथियार भी हो सकते हैं।

हथियार उनके लिए केवल रक्षा का साधन नहीं, बल्कि धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा भी माने जाते हैं।

अफगानों से लड़ाई में क्यों याद किए जाते हैं?

निहंगों की सबसे बड़ी ऐतिहासिक पहचान 18वीं शताब्दी में बनी। उस दौर में पंजाब पर अहमद शाह अब्दाली ने कई बार हमले किए। सिख समुदाय पर लगातार अत्याचार हो रहे थे और ऐसे समय में निहंग योद्धाओं ने सिखों की रक्षा में अहम भूमिका निभाई।

इतिहासकार बताते हैं कि उन्होंने गुरुद्वारों की रक्षा की, छापामार युद्ध लड़े और अफगान सेनाओं के खिलाफ कई मोर्चों पर मुकाबला किया। बाद में महाराजा रणजीत सिंह की सेना में भी निहंगों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

इसी सैन्य परंपरा ने उन्हें सिख इतिहास में विशेष स्थान दिलाया। आज भी उनकी वीरता की कहानियां पंजाब की लोक परंपरा और सिख इतिहास का अहम हिस्सा हैं।

आज निहंग कैसे संगठित हैं?

आज निहंग किसी एक संगठन के अधीन नहीं हैं। वे कई अलग-अलग डेरों और जत्थों में बंटे हुए हैं। हालांकि, ऐतिहासिक रूप से दो प्रमुख दल माने जाते हैं, बुद्धा दल और तरुणा (तरना) दल।

हर डेरा स्वतंत्र रूप से संचालित होता है। इनके अपने प्रमुख, अनुयायी और गतिविधियां होती हैं। यही वजह है कि किसी एक डेरा या व्यक्ति की कार्रवाई को पूरे निहंग समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं माना जा सकता।

निहंगों के डेरे केवल धार्मिक स्थल नहीं होते। वहां घुड़सवारी, गतका (सिख मार्शल आर्ट), पारंपरिक हथियारों का प्रशिक्षण और धार्मिक शिक्षा भी दी जाती है। कई बड़े डेरे खेती, गौशाला और सामाजिक सेवा के कार्य भी करते हैं।

निहंग सिख आज बार-बार विवादों में क्यों आते हैं?

हाल के सालों में निहंगों का नाम कई आपराधिक और हिंसक घटनाओं से जुड़ा है। इन घटनाओं के बाद पूरे निहंग समुदाय पर सवाल उठने लगे।

  • 2021 में सिंघु बॉर्डर पर लखबीर सिंह की हत्या के मामले में एक निहंग ने आत्मसमर्पण किया था।
  • इससे पहले 2020 में पंजाब के पटियाला में लॉकडाउन के दौरान पुलिस पर तलवार से हमला करने की घटना भी चर्चा में रही।

हालांकि, सिख समाज और इस विषय का अध्ययन करने वाले कई विद्वानों का कहना है कि पूरे समुदाय को कुछ व्यक्तियों की कार्रवाई के आधार पर नहीं आंका जा सकता। उनका तर्क है कि निहंग कोई एक केंद्रीकृत संगठन नहीं हैं। अलग-अलग डेरे स्वतंत्र रूप से काम करते हैं और समय के साथ कुछ डेरों में असामाजिक या आपराधिक तत्वों की घुसपैठ भी हुई है। यानी किसी एक निहंग की कार्रवाई को पूरे समुदाय की विचारधारा मान लेना सही नहीं होगा।

क्या निहंग और खालिस्तानी एक ही हैं?

यह भी एक बड़ी गलतफहमी है। निहंग एक पारंपरिक धार्मिक-योद्धा संप्रदाय हैं, जबकि खालिस्तान एक राजनीतिक विचार है। दोनों को एक-दूसरे का पर्याय नहीं माना जा सकता।इसी तरह, ऑपरेशन ब्लू स्टार के केंद्र में रहे संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले भी निहंग नहीं थे। वे दमदमी टकसाल के प्रमुख थे। हालांकि, उस समय स्वर्ण मंदिर परिसर में कुछ निहंग मौजूद थे, लेकिन इससे पूरे निहंग समुदाय को उस आंदोलन से जोड़ना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं माना जाता।

नीली पगड़ी-चोला, तलवार-भाला तक सीमित नहीं हैं…

कुल मिलाकर जाते-जाते कहना चाहूंगा, निहंग सिखों की पहचान केवल नीली पगड़ी, चोले और तलवार तक सीमित नहीं है। वे सिखों की लगभग 300 साल पुरानी योद्धा परंपरा के प्रतीक हैं, जिसने मुगलों और अफगान आक्रमणकारियों के खिलाफ समुदाय की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि, हाल के वर्षों में कुछ निहंगों से जुड़ी हिंसक घटनाओं ने उनकी सार्वजनिक छवि पर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में किसी एक डेरा या कुछ व्यक्तियों की कार्रवाई के आधार पर पूरे निहंग समुदाय का आकलन करना उचित नहीं माना जाता।

Ratan Gupta

लेखक के बारे में

Ratan Gupta

रतन गुप्ता एक डिजिटल हिंदी जर्नलिस्ट/ कॉन्टेंट प्रोड्यूसर हैं। वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान की स्टेट न्यूज टीम के साथ काम कर रहे हैं। वह क्राइम, राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर न्यूज आर्टिकल और एक्सप्लेनर स्टोरीज लिखते हैं।


रतन गुप्ता वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर स्टेट न्यूज टीम में काम करते हैं। इस टीम में हिंदी पट्टी के 8 राज्यों दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात से जुड़ी खबरों की कवरेज करते हैं। उनका लेखन खास तौर से क्राइम, राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित रहता है।


लाइव हिंदुस्तान में बीते 2 साल से काम करते हुए रतन ने ब्रेकिंग न्यूज, राजनीतिक घटनाक्रम और कानून-व्यवस्था से जुड़ी खबरों पर लगातार लेखन किया है। इसके साथ ही वह एक्सप्लेनर स्टोरीज लिखने में भी विशेष रुचि रखते हैं, जहां जटिल मुद्दों को सरल और तथ्यपरक भाषा में पाठकों के सामने रखते हैं।


रतन गुप्ता ने बायोलॉजी में ग्रेजुएशन किया है, जिसके बाद उन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई की है। साइंस बैकग्राउंड होने के कारण उनकी न्यूज और एनालिसिस स्टोरी में साइंटिफिक टेंपरामेंट, लॉजिकल अप्रोच और फैक्ट-बेस्ड सोच साफ दिखाई देती है। वह किसी भी मुद्दे पर रिपोर्टिंग करते समय दोनों पक्षों की बात, मौजूद तथ्यों और आधिकारिक स्रोतों को प्राथमिकता देते हैं, ताकि यूजर तक संतुलित और भरोसेमंद जानकारी पहुंचे।


इसके साथ ही आईआईएमसी की एकेडमिक पढ़ाई ने उन्हें रिपोर्टिंग, न्यूज प्रोडक्शन, मीडिया एथिक्स और पब्लिक अफेयर्स की गहरी समझ दी है। इसका सीधा असर उनके लेखन की विश्वसनीयता और संतुलन में दिखाई देता है।

और पढ़ें

लेटेस्ट   Hindi News ,    बॉलीवुड न्यूज,   बिजनेस न्यूज,   टेक ,   ऑटो,   करियर , और   राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।