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क्या है अर्ली वॉर्निंग सिस्टम और कैसे करता है काम; CM धामी ने केंद्र संग मीटिंग में उठाया मुद्दा

क्या है अर्ली वॉर्निंग सिस्टम और कैसे करता है काम; CM धामी ने केंद्र संग मीटिंग में उठाया मुद्दा

संक्षेप:

सीएम धामी ने पैरवीं की कि अर्ली वार्निंग सिस्टम, यानि आपदा की पूर्व सूचना देने वाला तंत्र का प्रभावी और आधुनिक होना जरूरी है ताकि समय पर चेतावनी दी जा सके और जान-माल की हानि को कम किया जा सके।

Sep 11, 2025 08:11 am ISTGaurav Kala लाइव हिन्दुस्तान, देहरादून
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उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बुधवार को सचिवालय में आपदा प्रभावित क्षेत्रों के सर्वेक्षण के लिए आई केंद्रीय टीम के साथ बैठक की, जिसमें उन्होंने प्रदेश में प्राकृतिक आपदाओं से रोकथाम और नुकसान कम करने के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया।

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सीएम धामी ने कहा कि उत्तराखंड आपदा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील राज्य है और मानसून के दौरान बाढ़, भूस्खलन तथा अतिवृष्टि जैसी समस्याओं का सामना करता है। उनका मानना है कि अर्ली वार्निंग सिस्टम, यानि आपदा की पूर्व सूचना देने वाला तंत्र का प्रभावी और आधुनिक होना जरूरी है ताकि समय पर चेतावनी दी जा सके और जान-माल की हानि को कम किया जा सके।

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क्या है अर्ली वॉर्निंग सिस्टम?

अर्ली वार्निंग सिस्टम एक वैज्ञानिक तंत्र है, जिसके जरिये मौसम, वर्षा, बाढ़ या अन्य आपदाओं की आशंका पहले ही बता दी जाती है। इसमें सेंसर, उपग्रह डेटा, मौसम केंद्रों की रिपोर्ट तथा भौगोलिक विश्लेषण के आधार पर खतरे का पूर्वानुमान लगाया जाता है। जैसे ही खतरे की संभावना बनती है, अलर्ट जारी किया जाता है—जिससे नागरिक या संबंधित विभाग समय रहते सुरक्षित कार्रवाई कर सकते हैं।

कैसे काम करता है अर्ली वॉर्निंग सिस्टम?

वैज्ञानिक उपकरणों और सॉफ्टवेयर के जरिये मौसम, जल स्तर व भूमि की स्थिति की निगरानी की जाती है। डेटा का विश्लेषण करके खतरे की संभावना या घटनास्थल की पहचान की जाती है। जिला प्रशासन, आपदा प्रबंधन विभाग और नागरिकों तक सूचना पहुँचाई जाती है ताकि राहत व बचाव के कदम उठाए जा सकें। इस तंत्र के उच्च स्तरीय विकास के लिए राष्ट्रीय व राज्य स्तर के वैज्ञानिक संस्थानों का सहयोग लिया जाता है।

बैठक में उठाया गया मुख्य मुद्दा

सीएम धामी ने केंद्रीय टीम के सामने मांग रखी कि उत्तराखंड में अर्ली वार्निंग सिस्टम को और आधुनिक व प्रभावी बनाया जाए और राष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्थान मिलकर पूर्वानुमान प्रणाली का विकास करें। उन्होंने यह भी कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन से जमीन के स्थाई नुकसान की स्थिति से निपटने के लिए कार्ययोजना बननी चाहिए। नदियों में सिल्ट भराव भी भविष्य में खतरा बढ़ा सकता है, जिसे लेकर केंद्रीय टीम ने चिंता जताई। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि इस सिस्टम के बेहतर होने से आपदाओं के दौरान बड़ा नुकसान रोका जा सकता है

Gaurav Kala

लेखक के बारे में

Gaurav Kala
गौरव काला को नेशनल, राजनीति, अंतरराष्ट्रीय, क्राइम और वायरल समाचार लिखना पसंद हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया में 10 साल कार्य का अनुभव। लाइव हिन्दुस्तान से पहले अमर उजाला, दैनिक जागरण और ईटीवी भारत जैसे मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। इन्होंने हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई की है। और पढ़ें

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