राजा परीक्षित का श्राप और मोक्ष राह की कथा सुनाई
हनुमदधाम में चल रहे श्रीमद भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिन बुधवार को कथावाचक ने वर्णन किया कि किस प्रकार धर्मनिष्ठ और प्रजापालक राजा परीक्षित ने क्र
हनुमदधाम में चल रहे श्रीमद भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिन बुधवार को कथावाचक ने वर्णन किया कि किस प्रकार धर्मनिष्ठ और प्रजापालक राजा परीक्षित ने क्रोधवश शमीक ऋषि के गले में मृत सर्प डाल दिया। इस घटना के बाद ऋषि पुत्र शृंगी ने उन्हें सात दिन में तक्षक नाग के काटने का श्राप दे दिया। आचार्य ने कहा कि यही श्राप आगे चलकर राजा परीक्षित के मोक्ष का कारण बना और भागवत कथा श्रवण का आधार बना। कथा के दौरान शुकदेव जी महाराज के प्रादुर्भाव का वर्णन हुआ। कथा वाचक डॉ. सुनील उनियाल ने बताया कि शुकदेव जी गर्भ से ही ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर चुके थे और जन्म लेते ही गृह त्याग कर वन चले गए।
यह प्रसंग वैराग्य और आत्मज्ञान की चरम अवस्था को दर्शाता है। कथा में भगवान कपिलदेव द्वारा माता देवहूति को दिया गया उपदेश भी सुनाया गया। इसमें आत्मा और प्रकृति के भेद, मोह-माया से मुक्ति और योगाभ्यास का महत्व बताया गया। कथा के अंत में देवी सती का प्रसंग सुनाया गया, जिन्होंने अपने पिता दक्ष प्रजापति द्वारा भगवान शिव का अपमान सहन न कर योगाग्नि में आत्माहुति दी। उन्होंने कहा कि यह कथा नारी के आत्मबल, अस्मिता और पति-भक्ति का जीवंत उदाहरण है। बताया कि श्रीमद भागवत मात्र पुराण नहीं, बल्कि जीवन की दिशा और दृष्टि है। जीवन की अंतिम यात्रा में भक्ति, वैराग्य और ज्ञान ही साथ चलते हैं। कथा श्रवण करने वालो में विष्णु महावर, सुमन मोहन ममगाईं, सरोज देवी, विमला मैठाणी, जयंती पटवाल, सुरेशानंद बेलवाल, पं. जीवन चंद्र भट्ट, रुद्र बहादुर थापा शामिल रहे।
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