18 साल से कम थी उम्र, 40 साल की नौकरी के बाद खुला राज; प्राइमरी टीचर पर ऐक्शन की तलवार
उत्तराखंड के कोटद्वार में राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय के एक टीचर पर कार्रवाई की तलवार लटक गई है। जांच के बाद खुलासा हुआ है कि ज्वाइनिंग के समय टीचर की उम्र 18 साल से कम थी। आरोपी शिक्षक 40 साल की सेवा पूरी कर चुका है। अब शिक्षक पर नौकरी जाने के साथ वित्तीय वसूली का संकट मंडरा रहा है।

उत्तराखंड के कोटद्वार में राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय के एक टीचर पर कार्रवाई की तलवार लटक गई है। जांच के बाद खुलासा हुआ है कि ज्वाइनिंग के समय टीचर की उम्र 18 साल से कम थी। आरोपी शिक्षक 40 साल की सेवा पूरी कर चुका है। अब शिक्षक पर नौकरी जाने के साथ वित्तीय वसूली का संकट मंडरा रहा है।
कोटद्वार के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, बालकनगर में तैनात प्राइमरी शिक्षक नफीस अहमद पर नियम विरुद्ध तरीके से नौकरी पाने का आरोप लगा है। भर्ती के समय शिक्षक की उम्र 18 साल से कम थी। यह राज तब खुला जब आरोपी 40 साल की सेवा पूरी कर चुका था। खास बात ये है कि आरोपी शिक्षक को 2023 में प्रतिष्ठित शैलेश मटियानी पुरस्कार भी मिल चुका है। अब शिक्षक पर नौकरी और पुरस्कार वापसी के साथ वित्तीय वसूली का संकट मंडरा रहा है।
दो वर्ष की सेवा शेष
आरोप की विभागीय जांच होने पर पुष्टि हुई कि नियुक्ति के समय उनकी आयु मानक से कम थी। मामले में जिला शिक्षा अधिकारी,पौड़ी ने प्रारंभिक शिक्षा निदेशक कंचन देवराड़ी को रिपोर्ट भेज दी। देवराड़ी ने बताया कि शिक्षक की नियुक्ति अविभाजित यूपी के समय हुई थी। मामले में सभी कानूनी पहलुओं पर विधिक राय लेने के बाद कार्रवाई करेंगे। नफीस की दो वर्ष की सेवा शेष है और उन पर कार्रवाई की लटक रही है।
नियुक्ति के समय 4 माह 19 दिन कम थी उम्र
इस मामले में स्थानीय पार्षद विपिन डोबरियाल ने शिकायत दर्ज कराई कि नफीस अहमद की नियुक्ति 1985 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन नियमों के तहत हुई थी। इसमें शिक्षक बनने के लिए न्यूनतम आयु सीमा 18 वर्ष होना जरूरी था। विभागीय जांच में खुलासा हुआ कि नियुक्ति के समय नफीस अहमद की उम्र 17 साल सात माह और 11 दिन थी। तकनीकी रूप से 18 साल पूरे होने में चार माह 19 दिन कम होने के बावजूद वह सरकारी शिक्षक बन गए।
लेखक के बारे में
Subodh Kumar Mishraसुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।
ज्यादातर नेशनल और स्टेट डेस्क पर काम करने का अवसर मिलने के कारण राजनीतिक और सामाजिक विषयों से जुड़ी खबरों में दिलचस्पी बढ़ती गई। कई लोकसभा और विधानसभा चुनावों की खबरों की पैकेजिंग टीम का हिस्सा रहने के कारण भारतीय राजनीति के गुणा-भाग को समझने का मौका मिला।
शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो सुबोध ने बीएससी (ऑनर्स) तक की अकादमिक शिक्षा हासिल की है। साइंस स्ट्रीम से पढ़ने के कारण उनके पास चीजों को मिथ्यों से परे वैज्ञानिक तरीके से देखने की समझ है। समाज से जुड़ी खबरों को वैज्ञानिक कसौटियों पर जांचने-परखने की क्षमता है। उन्होंने मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। इससे उन्हें खबरों के महत्व, खबरों के एथिक्स, खबरों की विश्वसनीयता और पठनीयता आदि को और करीब से सीखने और लिखने की कला में निखार आया। सुबोध का मानना है कि खबरें हमेशा प्रमाणिकता की कसौटी पर कसा होना चाहिए। सुनी सुनाई और कल्पना पर आधारित खबरें काफी घातक साबित हो सकती हैं, इसलिए खबरें तथ्यात्मक रूप से सही होनी चाहिए। खबरों के चयन में क्रॉस चेकिंग को सबसे महत्वपूर्ण कारक मानने वाले सुबोध का काम न सिर्फ पाठकों को केवल सूचना देने भर का है बल्कि उन्हें सही, सुरक्षित और ठोस जानकारी उपलब्ध कराना भी है।
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