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गर्भवती महिलाओं को सरकारी नौकरी से वंचित नहीं कर सकते, उत्तराखंड हाईकोर्ट का अहम फैसला

हाईकोर्ट ने यह फैसला मिशा उपाध्याय द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई में दिया, जिसे गर्भावस्था के कारण नैनीताल के बी.डी. पांडे अस्पताल में नर्सिंग ऑफिसर के पद से वंचित कर दिया गया था।

गर्भवती महिलाओं को सरकारी नौकरी से वंचित नहीं कर सकते, उत्तराखंड हाईकोर्ट का अहम फैसला
Praveen Sharmaदेहरादून। लाइव हिन्दुस्तानSun, 25 Feb 2024 09:09 AM
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उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में उस नियम को रद्द कर दिया, जो गर्भवती महिलाओं को सरकारी नौकरियों के लिए उपयुक्त मानने से रोकता था। हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि "मां बनना एक बड़ा आशीर्वाद' है और इसके कारण महिलाओं को रोजगार से वंचित नहीं किया जा सकता है।"

हाईकोर्ट ने यह फैसला मिशा उपाध्याय द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई में दिया, जिसे गर्भावस्था के कारण नैनीताल के बी.डी. पांडे अस्पताल में नर्सिंग ऑफिसर के पद से वंचित कर दिया गया था।

द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, डीजी मेडिकल हेल्थ और फैमिली वेलफेयर द्वारा मीशा को अपॉइंटमेंट लैटर जारी किए जाने के बावजूद अस्पताल ने फिटनेस सर्टिफिकेट का हवाला देते हुए उन्हें नौकरी जॉइन करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था, जिसमें उन्हें "नौकरी के लिए अस्थायी रूप से अनफिट" घोषित किया गया था, लेकिन गर्भावस्था के अलावा कोई अन्य स्वास्थ्य समस्या नहीं बताई गई थी। 

जस्टिस पंकज पुरोहित की सिंगल जज बेंच ने शुक्रवार को अस्पताल को निर्देश दिया कि ''तुरंत सुनिश्चित करें कि याचिकाकर्ता, जो 13 सप्ताह की गर्भवती है, नर्सिंग ऑफिसर के पद पर शामिल हो।'' बेंच ने 'भारत के राजपत्र (असाधारण) नियमों' पर 'गहरी नाराजगी' व्यक्त की, जिसमें 12 सप्ताह से अधिक गर्भावस्था वाली महिलाओं को 'अस्थायी रूप से अयोग्य' के रूप में लेबल किया गया है और कहा गया है कि ''मातृत्व एक महिला को प्रकृति द्वारा प्रदान किए गए सबसे बड़े और महान आशीर्वादों में से एक है।''

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर देते हुए कि किसी महिला को ''इस कारण से रोजगार से वंचित नहीं किया जा सकता है'' जैसा कि राज्य द्वारा बताया गया है, इस कठोर नियम से इसमें देरी भी नहीं की जा सकती है'', अदालत ने राज्य सरकार की कार्रवाई को ''महिलाओं के खिलाफ अत्यधिक संकीर्ण'' माना और जोर देकर कहा कि इसे ''बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।' कोर्ट ने कहा, ''यह निश्चित रूप से संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 का उल्लंघन है।''

बेंच ने मातृत्व अवकाश को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देते हुए "गर्भावस्था के आधार पर रोजगार से इनकार करने में विरोधाभास" की ओर भी इशारा किया। जस्टिस पुरोहित ने कहा, "अगर ऐसी स्थिति की कल्पना की जाती है कि एक महिला जो नई नियुक्ति पर सेवा में शामिल होती है और शामिल होने के बाद गर्भवती हो जाती है, तो उसे मातृत्व अवकाश मिलेगा, तो फिर एक गर्भवती महिला नई नियुक्ति पर अपनी ड्यूटी जॉइन क्यों नहीं हो सकती? नौकरी में शामिल होने के बाद वह भी मातृत्व अवकाश की हकदार होंगी।"

विशेषज्ञों ने कहा कि यह फैसला अन्य राज्यों के लिए एक मिसाल कायम कर सकता है और सुनिश्चित करेगा कि महिलाओं के साथ उनकी गर्भावस्था की स्थिति के आधार पर भेदभाव न किया जाए। दून की रहने वाली वकील सोमिका अधिकारी ने कहा कि यह फैसला कामकाजी महिलाओं में आत्मविश्वास लाएगा, खासकर उन महिलाओं में जो कभी-कभी गर्भावस्था के दौरान अपने कार्यस्थल पर कठिनाइयों का सामना करती हैं। 

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