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संविधान बनाते वक्त जब UCC का हुआ विरोध और पक्ष में खड़े हो गए आंबेडकर; खूब हुई बहस

उत्तराखंड सरकार ने मंगलवार को राज्य विधानसभा के विशेष सत्र में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पेश कर दिया। यूससी पर चर्चा आज नई बात नहीं है, आजादी के समय से ही इस पर मंथन होता रहा है।

संविधान बनाते वक्त जब UCC का हुआ विरोध और पक्ष में खड़े हो गए आंबेडकर; खूब हुई बहस
Sudhir Jhaहिन्दुस्तान,नई दिल्लीWed, 07 Feb 2024 09:53 AM
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उत्तराखंड सरकार ने मंगलवार को राज्य विधानसभा के विशेष सत्र में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पेश कर दिया। यूसीसी पर यह चर्चित विधेयक तब आया, जब सर्वोच्च न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में सरकार द्वारा नियुक्त पैनल ने पिछले सप्ताह एक मसौदा प्रस्तुत किया, जिसे सहज ही राज्य कैबिनेट की मंजूरी मिल गई। इस विधेयक में लिव-इन रिलेशनशिप सहित विभिन्न मुद्दों पर विस्तृत प्रावधान किए गए हैं, जिन पर चर्चा तेज हो गई है और कुछ दिशाओं से विरोध भी।

न्यायपालिका के विभिन्न निर्णयों के अनुरूप, उत्तराखंड सरकार ने राज्य में सभी लिव-इन रिलेशनशिप को पंजीकृत करने का निर्णय लिया है। इसके अलावा, उत्तराखंड के निवासी, जो राज्य के बाहर लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं, उन्हें राज्य के रजिस्ट्रार को एक बयान भी देना होगा। मतलब, इस बन रहे कानून का असर उत्तराखंड राज्य के बाहर भी पड़ना तय है। विधेयक में यह भी कहा गया है कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले किसी भी जोड़े की संतान वैध ही मानी जाएगी। इसमें कोई शक नहीं है कि आधुनिक दौर में बदलते रिश्तों को समझने और उसके अनुरूप कानून बनाने की यह कवायद विशेषज्ञों को भी ठीक लग रही है।

यूसीसी क्यों जरूरी है?
हमारे यहां संविधान में सभी कानून समान हैं। चाहे वह सीपीसी हो या सीआरपीसी, आईपीएसी हो या भूमि संबंधी मामले हों, सभी जाति धर्म के लोगों के लिए समान हैं। केवल व्यक्तिगत मामलों को हमारे संविधान में उस समय यह कहते हुए छोड़ा गया था कि अभी देश का बंटवारा हुआ है और यह समय समान नागरिक संहिता लाने के लिए उचित नहीं है। इसे उचित समय पर चर्चा करके लाया जाए, इस मुद्दे को नीति निर्देशक तत्वों में रख दिया गया। साथ ही, केंद्र और राज्य सरकारों को यह अधिकार दिया गया कि समय आने पर या उपयुक्त समय पर इस पर कानून बना सकेंगी। इसी के तहत 1973 के बाद अनेक विषयों में उच्चतम न्यायालय ने कई मामलों में यह टिप्पणी की है कि समान नागरिक संहिता इस देश के लिए आवश्यक है और इसे जल्द लाया जाना चाहिए। पर्सनल सिविल लॉ में महिलाओं और पुरुषों में बहुत बड़ी असमानता है और इसमें महिला अधिकारों का हनन होता है। अत इसे ध्यान में रखते हुए समान नागरिक संहिता का आना जरूरी माना जा रहा था। यूसीसी से जुड़े एक विशेषज्ञ के अनुसार, यूसीसी लाने का एकमात्र मुख्य उद्देश्य जो है, वो महिलाओं को हर विषय पर पुरुषों के समान लेकर आना है।

देश में यह कभी लागू नहीं रहा
इस देश में कभी भी समान नागरिक संहिता लागू नहीं रही है। सिर्फ इस देश में गोवा की आजादी से पहले जब पुर्तगालियों का शासन था, तब पुर्तगालियों का सिविल कोड वहां लागू था, वह भी व्यक्तिगत नागरिक मामलों के लिए। जब गोवा आजाद हुआ, तब एक आदेश द्वारा पुराने चल रहे कानून को यथावत रखने का प्रावधान किया गया। इसी कारण गोवा में पुर्तगालियों द्वारा लाई गई समान नागरिक संहिता अभी भी चल रही है। गोवा के बाद उत्तराखंड देश का पहला राज्य होगा, जहां समान नागरिक संहिता लागू करने के प्रयास मूर्त रूप ले रहे हैं।

अनेक देशों में ऐसे ही प्रावधान
दुनिया के अनेक देश हैं, जहां समान नागरिक संहिता है। अनेक देशों में सभी जाति-धर्म के लोगों के लिए समान कानून हैं। जैसे विवाह की उम्र। साल 2022 में महिला अधिकारों को या तलाक को लेकर, विवाह की न्यूनतम आयु को लेकर सऊदी अरब में अपनी संहिता आई। बांग्लादेश, इंडोनेशिया, अजर बैजान, जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका, कनाडा, इत्यादि अनेक देशों में इस तरह के प्रावधान मौजूद हैं और किसी तरह की शिकायत नहीं है।

अब आगे क्या तैयारी?
यह बड़ा सवाल है कि लोगों को इसके लिए कैसे तैयार किया जाएगा? ध्यान देने की बात है, बड़े पैमाने पर उत्तराखंड में सलाह-मश्विरा का काम किया गया है। सभी धर्मगुरुओं से चर्चा हुई और वो भी मानते हैं कि हमारे यहां कई जगह महिलाओं को लेकर कुछ रीतियां गलत हैं, कई बड़े-बड़े मौलाना ने भी इसमें सुधार की बात कही है और महिलाएं इसकी बहुत पक्षधर हैं। सभी अल्पसंख्यक, चाहे सिख समाज हो, ईसाई हों या बौद्ध हों, जैन हों, उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर सलाह लेने का काम हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार, आजाद भारत में ऐसी कवायद दुर्लभ ही है। इतिहास में पहली बार हुआ है कि 2 लाख 33 हजार के करीब सुझाव समान नागरिक संहिता के लिए गठित समिति को मिले हैं। इसका मतलब उत्तराखंड में लगभग दस प्रतिशत परिवारों ने सुझाव दिए हैं। बड़े पैमाने पर बैठकें हुई हैं, विचार-विमर्श किया गया है।

यूसीसी का विरोध भी खूब हो रहा है। विरोध उत्तराखंड में उतना नहीं है, जितना बाहर है। विरोध करने वालों को लग रहा है कि आज उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता बन रही है, तो भविष्य में दूसरे प्रदेशों में भी बनेगी। वैसे समान नागरिक संहिता की चर्चा भारत में नई नहीं है और इसके लिए कवायद पहले भी खूब हुई है। ध्यान रहे, जिस समय संविधान बनाया जा रहा था, उस समय समुदायों का उनके व्यक्तिगत कानूनों द्वारा शासित होने का 150 साल लंबा इतिहास रहा था। इसे महसूस करते हुए संविधान निर्माताओं ने समान संहिता को तब असंभव माना था और इसे एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य के रूप में छोड़ दिया गया था। ज्यादातर विशेषज्ञ मानते हैं, सहमति बनाते हुए अब आगे बढ़ने का समय आ गया है।

संविधान बनाते हुए भी खूब हुई थी बहस
जिस समय संविधान बनाया जा रहा था, उस समय समुदायों का उनके व्यक्तिगत कानूनों द्वारा शासित होने का 150 साल लंबा इतिहास रहा था। इसे महसूस करते हुए संविधान निर्माताओं ने समान संहिता को तब असंभव माना था और इसे एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य के रूप में छोड़ दिया गया था। ज्यादातर विशेषज्ञ मानते हैं, सहमति बनाते हुए अब आगे बढ़ने का समय आ गया है।

हम ऐसा पहले ही कर चुके हैं: बाबा साहब भीमराव आंबेडकर
मेरे मित्र मिस्टर हुसैन इमाम ने संशोधनों का समर्थन करते समय पूछा था कि क्या इतने वृहद् देश के लिए कानूनों की एकविध संहिता बनाना सम्भव तथा वांछनीय है? मुझे स्वीकार करना होगा कि मुझे उस बात पर बहुत आश्चर्य हुआ, क्योंकि हमारे यहां इस देश में मानवीय सम्बंधों के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में कानूनों की एकविध संहिता है। ...मैं असंख्य उदाहरण दे सकता हूं, जिनसे यह सिद्ध हो जाएगा कि इस देश में लगभग एक ही व्यवहार संहिता है, जो एकविध है तथा समस्त देश में लागू है। अब तक केवल एक प्रदेश में व्यवहार कानून हस्तक्षेप नहीं कर सका है, वह विवाह तथा उत्तराधिकार का प्रदेश है। ...हमने वास्तव में उन सब विषयों पर कानून बना दिए हैं, जो कि इस देश में एकविध व्यवहार संहिता में निहित होते हैं। अत अब यह पूछने का समय बीत चुका कि क्या हम ऐसा कर सकते हैं? हम ऐसा पहले ही कर चुके हैं।

विभेद को भूल जाइए: के एम मुंशी
हिन्दुओं में भी ऐसे बहुत लोग हैं, जो एकविध व्यवहार-संहिता नहीं चाहते, क्योंकि उनका भी वही दृष्टिकोण है, जो पूर्व वक्ता मुस्लिम सदस्यों का है। उनकी यह भावना है कि उत्तराधिकार आदि का निजी कानून वास्तव में उनके धर्म का भाग है। यदि ऐसा है, तो उदाहरणार्थ आप महिलाओं को समानता कभी प्रदान नहीं कर सकते। किंतु आपने अभी इस आशय का मूलाधिकार पारित किया है और आपके यहां एक अनुच्छेद है, जिसमें लिखा है कि लिंग के आधार पर कोई विभेद नहीं किया जाएगा,... पर आप कोई भी कानून पारित नहीं कर सकते, जिससे स्त्रियों की अवस्था पुरुषों के समान बनाई जा सके। अत कोई कारण नहीं कि सारे भारत के लिए एक व्यवहार संहिता क्यों न हो। ...मेरे मुस्लिम मित्र इसे समझ लें कि जितना जल्दी हम जीवन की इस पार्थक्य भावना को भूल जाएंगे, उतना ही देश के लिए अच्छा होगा। 

ऐसा करना ठीक नहीं: बी पोकर साहिब
मैं नहीं जानता कि इस अनुच्छेद के बनाने वालों का इससे क्या आशय है। ...अगर इसे कहीं से नकल किया गया है, तो मैं उस विधान में भी इस प्रावधान की निंदा करूंगा। जिन देशों में परिस्थितियां सर्वथा भिन्न हैं, उनके विधानों से धाराओं की नकल करना बहुत सरल है। ...इस एकरूपता से क्या प्रयोजन सिद्ध होगा, सिवाय इसके कि लोगों की आत्मा का हनन होगा और उनमें यह भावना उत्पन्न हो जाएगी कि उनके धार्मिक अधिकारों तथा आचरणों के विषय में उन्हें कुचला जा रहा है? हमारे विधान में ऐसी कठोर व्यवस्था नहीं रखी जानी चाहिए। ...बहुसंख्यक जाति इस विचार की है, तो भी मैं कहता हूं कि इसकी निंदा की जानी चाहिए, और यह होने नहीं देना चाहिए, क्योंकि जनतंत्र में, जैसा कि मैं समझता हूं बहुसंख्यकों का यह कर्त्तव्य है कि वे प्रत्येक अल्पसंख्यक जाति को उनके पवित्र अधिकार प्राप्त कराएं।

बाद में ऐसा कीजिएगा:  हुसैन इमाम
देश है, इसकी भारी जनसंख्या इतनी विभिन्न है कि उस पर एक प्रकार का कोई रंग चढ़ाना लगभग असम्भव है। ...देश के कुछ भाग अत्यन्त पिछड़े हुए हैं। असम के आदिवासियों को देखिए, उनकी क्या अवस्था है? क्या आप उनके लिए वैसा ही कानून बना सकते हैं, जैसा आप बम्बई के प्रगतिशील लोगों के लिए बना सकते हैं? आपको काफी अंतर रखना होगा। श्रीमान, मेरे विचार में एकविध कानून बनाना सर्वथा उपयुक्त तथा अति वांछनीय है, किंतु बहुत समय पश्चात ही ऐसा करना चाहिए। हमें उस समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए, जब कि सारा भारत शिक्षित हो जाए, जब जनसाधारण की निरक्षरता दूर हो जाए, जब लोग प्रगतिशील हो जाएं, जब उनकी आर्थिक अवस्था अब से अच्छी हो जाए, जब प्रत्येक मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा होने लगे तथा अपने जीवन-संग्राम में स्वयं लड़ सके। तब आप एकविध कानून बना सकते हैं।

उत्तराखंड में सियासी समीकरण
भाजपा ही नहीं, कांग्रेस भी समान नागरिक संहिता के पक्ष में रही है। उत्तराखंड की 70 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के पास 47 सीटों के साथ बहुमत है, अत विधेयक को पारित होने में यहां असुविधा नहीं होगी। राज्यपाल या राष्ट्रपति के स्तर पर इसे मंजूरी न मिलने की आशंका नहीं है। उत्तराखंड में भी कांग्रेस इस विधेयक के विरोध में नहीं है, उसे केवल विधेयक पेश करने के तरीके पर आपत्ति है। हां, कुछ दलों के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठों में हलचल है, पर मुस्लिमों के बीच इसके लिए समर्थन भी खूब दिख रहा है। इसके होने से किसी भी देश में एकरूपता आती है और सामाजिक मजबूती भी बढ़ती है।

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