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जब दुनिया की फौलादी मशीनें हुईं नाकाम, तब रैट माइनर्स ने किया कमाल, हाथों से भेद डाली सुरंग

उत्तरकाशी जिले के सिलक्यारा सुरंग में फंसे 41 श्रमिकों को निकालने के लिए बचाव अभियान में उन रैट माइनर्स के काम को देशभर में सराहा जा रहा है जिन्होंने मलबे से भरी सुरंग में हाथों से ड्रिलिंग की है।

जब दुनिया की फौलादी मशीनें हुईं नाकाम, तब रैट माइनर्स ने किया कमाल, हाथों से भेद डाली सुरंग
Krishna Singhलाइव हिंदुस्तान,नई दिल्लीWed, 29 Nov 2023 04:13 AM
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बीते 16 दिन से उत्तरकाशी जिले के सिलक्यारा सुरंग में फंसे 41 श्रमिकों को निकालने में मंगलवार शाम को कामयाबी मिल गई। इस राहत और बचाव अभियान में जमीन पर काम करने वाले उन कर्मचारियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी जिन्होंने रात दिन मेहनत की। खासकर उन रैट माइनर्स के काम को देशभर में सराहा जा रहा है जिन्होंने मलबे से भरी सुरंग में हाथों से ड्रिलिंग की है। ऐसे में जब दुनिया की फौलादी मशीनें नाकाम हो गई थीं और विशेषज्ञों को भी कुछ सूझ नहीं रहा था तब भारतीय रैट माइनर्स ने हाथों से ही सुरंग को भेद डाला। प्रस्तुत है इन रैट माइनर्स के साहसिक कार्य पर एक नजर...

फौलादी मशीनें हुईं नाकाम
बताया जाता है कि सिलक्यारा सुरंग में फंसे 41 श्रमिकों को बाहर निकालने के लिए मलबे से भरी सुरंग में क्षैतिज ड्रिलिंग की जा रही थी। इसके लिए दुनिया की सर्वोत्तम मशीनरी का इस्तेमाल किया जा रहा था। सुरंग से मजदूरों को बाहर निकालने के लिए मलबे से भरी सुरंग में एक मीटर ब्यास का पाइल डाला जा रहा था। इसके लिए सुरंग के मलबे में ड्रिलिंग के काम के लिए 25 टन वजनी अमेरिकी ऑगर मशीन लगाई गई थी। इस मशीन ने तेजी से काम करना शुरू किया था। सब कुछ ठीक चल रहा था और 10-12 मीटर मलबे को भेदने का काम बाकी रह गया था, उसी समय एक बड़ी बाधा सामने आ गई। 

जब टूटने लगी थी उम्मीदें
बीते शुक्रवार को क्षैतिज 'ड्रिलिंग' कर रही ऑगर मशीन के पंख मलबे में फंस गए थे। विशेषज्ञों का कहना था कि मलबे में स्टील की छड़ें और पाइप थे जो आगर मशीन में फंस गए थे। इससे आगर मशीन टूट गई थी। मशीन को दोबारा शुरू करने की संभावनाएं खत्म हो जाने के बाद बचाव के काम में जुटे विशेषज्ञों चिंतित थे। इसके बाद बचाव के अन्य विकल्पों पर काम शुरू किया गया था। वैकल्पिक रास्ता बनाने के लिए रविवार से पहाड़ी के ऊपर से 'ड्रिलिंग' का काम भी शुरू कर दिया गया था। इसके बाद रैट माइनर्स की मदद लेने पर भी विचार किया गया। 

असंभव को किया संभव
आखिरकार मलबे से भरी सुरंग के शेष बचे 10-12 मीटर के हिस्से में ड्रिलिंग के लिए देश के रैट माइनर्स को बुलाया गया। रैट माइनर्स ने पाइप के रास्ते में आने वाली बाधाओं को हाथ से हटाने का काम किया और प्रतिकूल परिस्थितियों में सरिया या गर्डर को काटकर हटाने का काम किया। पहले दिन तो आगे बढ़ने में कोई खास सफलता नहीं मिली। इसी वजह से कहा जा रहा था कि बचाव अभियान में अभी कई दिन लग सकते हैं। लेकिन रैट माइनर्स की मेहनत और लगन ने असंभव से लग रहे काम को संभव कर दिया। 

24 घंटे लगातार काम
सोमवार देर रात से रैट माइनर्स ने काम करना शुरू किया। रैट माइनर्स को दो या तीन लोगों की टीम में विभाजित किया गया। हर टीम एस्केप पैसेज में बिछाई गई स्टील पाइप में बारी बारी से जाती थी और हाथों से ड्रिलिंग का काम करती थी। रैट ड्रिलिंग तकनीक के विशेषज्ञ राजपूत राय की मानें तो एक रैट माइनर ड्रिलिंग कर रहा होता तब दूसरा मलबे को इकटठा करता और इसी समय तीसरा मलबे को बाहर निकालने के लिए उसे ट्रॉली पर लोड करने का काम कर रहा होता था। रैट माइनर्स ने लगातार 24 घंटे से अधिक समय तक काम किया है।

रात भर की ड्रिलिंग, बोले- हमारे लिए कुछ भी असंभव नहीं
समाचार एजेंसी पीटीआई भाषा की रिपोर्ट के मुताबिक, मौके पर 12 रैट माइनर विशेषज्ञों को बुलाया गया था। बचाव अभियान पूरा होने के बाद रैट माइनर्स भी श्रमिकों के साथ खड़े नजर आए, उनके चेहरे रात भर की ड्रिलिंग के बाद सफेद धूल से सने थे। रैट माइनर में से एक फिरोज कुरैशी ने मुस्कुराते हुए कहा- यह एक कठिन काम था, लेकिन हमारे लिए कुछ भी मुश्किल नहीं है। रैट माइनर नासिर हुसैन ने कहा- जब हमने सफलता के बाद उन्हें सुरंग के अंदर देखा, तो हमने उन्हें ऐसे गले लगाया जैसे वे अपने परिवार के सदस्य हों। 

एनजीटी ने 2014 में रैट माइनिंग पर लगा दिया था प्रतिबंध
रैट माइनिंग ड्रिलिंग एक खतरनाक और विवादास्पद तरीका है। इसमें माइनर ठीक वैसे ही ड्रिलिंग करते हैं जैसे चूहे जमीन में बिल बनाते हैं। इसी वजह से इसका नाम रैट माइनिंग पड़ा। इसमें माइनर्स सुरक्षा उपायों और उचित वेंटिलेशन के बिना काम करते हैं। इसका उपयोग पूर्वोत्तर राज्य मेघालय में कोयला निकालने के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है। साल 2014 में एनजीटी ने पर्यावरणीय क्षति और कई मौतों के कारण रैट माइनिंग पर प्रतिबंध लगा दिया था। रेस्क्यू अभियान में शामिल रैट माइनर्स ने कहा- वे कोयला खनन में शामिल नहीं थे। उन्होंने दिल्ली में प्रशिक्षण लिया था। 

अवैध कोयला खनन में मारे जा चुके हैं 10,000 से 15,000 लोग 
जनवरी 2019 की घटना है जब मेघालय में एक रैट होल खदान में एक महीने से अधिक समय तक फंसे रहने के बाद कम से कम 15 माइनर्स मारे गए थे। मेघालय में हुई कई त्रासदियों पर एक अधिकार समूह का कहना है कि 2007 से 2014 के बीच ऐसी खदानों में 10,000 से 15,000 लोग मारे गए हैं। 1970 के दशक में रैट माइनिंग अवैध हो गई, जब भारत सरकार ने कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। सरकार ने सरकारी कंपनी कोल इंडिया को कोयला खनन का एकाधिकार दे दिया था। फिर भी, कई छोटे खदान मालिकों ने अवैध रूप से कोयला निकालने के लिए छोटे कद के लोगों या बच्चों को काम पर रखना जारी रखा था। कोयले की निम्न गुणवत्ता को देखते केंद्र ने भी ज्यादा सख्ती नहीं दिखाई थी। 

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