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रैट होल माइनिंग से लेकर वर्टिकल ड्रिलिंग तक, उत्तरकाशी टनल में इस्तेमाल हुए ये प्रोसेस

उत्तराखंड की सिलक्यारा सुरंग में बचाव कर्मियों ने मंगलवार को मलबे के अंदर 60 मीटर तक ड्रिलिंग का काम पूरा कर लिया । अब बचाव पाइप के अंतिम हिस्से को ड्रिल करके बनाए गए रास्ते से भीतर डाला जा रहा है

रैट होल माइनिंग से लेकर वर्टिकल ड्रिलिंग तक, उत्तरकाशी टनल में इस्तेमाल हुए ये प्रोसेस
Swati Kumariवैष्णवी सिन्हा,उत्तरकाशीTue, 28 Nov 2023 03:07 PM
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Uttarakhand Silkyara Tunnel: उत्तराखंड के उत्तरकाशी में सिलक्यारा सुरंग में 16 दिनों से 41 मजदूर फंसे हैं। सुरंग में फंसे मजदूरों को बाहर निकालने के लिए युद्ध स्तर पर बचाव अभियान चल रहा है। जल्द ही सफलता मिलने की संभावना है। वहीं, उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी ने कहा, '52 मीटर तक ड्रिलिंग का काम पूरा हो चुका है। साथ ही 57 मीटर पर ब्रेकथ्रू मिल सकता है। कल से मैन्युअल ड्रिलिंग जारी है। मैन्यूअल ड्रिलिंग के लिए दिल्ली से एक्सपर्ट बुलाए गए हैं।' बता दें कि 12 लोगों की ये टीम रैट माइनिंग तकनीक पर काम करती है। 

क्या है रैट होल माइनिंग?
सिल्क्यारा टनल में इस वक्त 41 मजदूर 60 मीटर की दूरी पर फंसे हैं। अमेरिकी ऑगर मशीन से 48 मीटर तक की खुदाई पूरी कर लगी गई थी। लेकिन जब 10-12 मीटर की ड्रिलिंग ही बाकी रह गई थी जब मशीन बीच में ही खराब हो गई। मशीन के हिस्सों को बाहर निकाल लिया गया है और जहां पर मशीन ने खुदाई छोड़ी थी वहीं से रैट होल माइनर्स ने खुदाई शुरू कर दी है। इसमें मैनुअली ड्रिलिंग की जाती है इसलिए इस प्रक्रिया में थोड़ा समय लग सकता है। लेकिन यह कारगर साबित हो सकती है। इस प्रक्रिया में होता क्या है कि संकीर्ण गड्ढों के जरिए माइनर्स कोयला निकालने के लिए जाते हैं। मेघायल में विशेष रूस से इस प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता है। माइनर्स रस्सियों और बांस के जरिए कोयले की परत तक पहुंचते हैं। रैट होल माइनिंग ज्यादातर संकीर्ण सुरंगों में की जाती है और माइनर्स हॉरिजोंटल सुरंगों में कई सैकड़ों फीट तक नीचे उतरते हैं। 

समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड सरकार के नोडल अधिकारी नीरज खैरवाल ने साफ किया कि साइट पर लाए गए लोग रैट होल माइनिंग नहीं थे, बल्कि तकनीक में विशेषज्ञ थे।

क्या है वर्टिकल ड्रिलिंग?
वर्टिकल ड्रिलिंग एक प्रोसेस है, इसमें हम पृथ्वी की सतह के नीचे अर्थ शाफ्ट बनाते हुए बोर होल ड्रिल करते हैं। यह वेंटिलेशन और संचार के लिए सीधी पहुंच के लिए है। अगर बोर होल पर्याप्त चौड़ा है तो हम फंसे हुए लोगों को निकाल सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भौगोलिक तनाव अलग-अलग स्तर पर अलग-अलग होता है, इसलिए वर्टिकल तनाव पर अधिकतम दबाव होगा। यहां पर केसिंग के जरिए चट्टानों को बोरवेल में गिरने से रोका जा सकेगा। आईआईटी गुवाहाटी में सिविल इंजीनियरिंग के सहायक प्रोफेसर विवेक पद्मनाभ वर्टिकल ड्रिलिंग के बारे में बताते हुए कहते हैं कि जब हम सुरंग बनाने की कोशिश करते हैं तो मिट्टी और चट्टानों पर भारी मात्रा में दबाव पड़ता है। या इसे भू-तनाव भी कहा जाता है और इससे संतुलन बिगड़ जाता है।

क्या है ऑगर मशीन?
ऑगर मशीन को हिंदी में बरमा मशीन या ड्रिलिंग मशीन भी कहा जाता है, जिसका काम जमीन में छेद करना होता है। जयपुर की जेबी इंडस्ट्रीज कई सालों से ऑगर मशीन बनाने का काम कर रही है। ऑगर मशीन, वर्टिकली और होरिजेंटली दोनों तरीके से छेद करने में काम आती है। एक पाइप के ऊपर गोल-गोल प्लेट्स लगाते हैं और आगे की तरफ यानी मुंह पर कटिंग एज होता है, जो मिट्टी या चट्टान को काटने का काम करता है।

12 नवंबर टनल में फंसे हैं 41 श्रमिक 
गौरतलब है कि यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर बन रही सिलक्यारा सुरंग का एक हिस्सा 12 नवंबर को ढह गया। इसके चलते उसमें काम कर रहे श्रमिक फंस गए थे। उन्हें बाहर निकालने के लिए युद्ध स्तर पर कई एजेंसियों द्वारा बचाव अभियान चलाया जा रहा है। नोडल अधिकारी नीरज खैरवाल ने रविवार शाम सात बजे तक की स्थिति बताते हुए कहा था कि मलबे में ऑगर मशीन का केवल 8.15 मीटर हिस्सा ही निकाला जाना शेष रह गया है। 

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