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वर्टिकल ड्रिलिंग, ऑगर मशीन और फिर मैनुअल खुदाई तक, उत्तरकाशी टनल रेस्क्यू ऑपरेशन में ऐसे बची 41 की जान

रेस्क्यू ऑपरेशन को पूरा करने के लिए वर्टिकल ड्रिलिंग, ऑगर मशीन और फिर मैनुअल खुदाई भी की गई। उत्तरकाशी टनल में पिछले 17 दिनों से जिंदगी से जंग लड़कर 41 मजूदरों की जीत हुई है। कई प्लान बनाए गए थे।

वर्टिकल ड्रिलिंग, ऑगर मशीन और फिर मैनुअल खुदाई तक, उत्तरकाशी टनल रेस्क्यू ऑपरेशन में ऐसे बची 41 की जान
Himanshu Kumar Lallउत्तरकाशी, लाइव हिन्दुस्तानTue, 28 Nov 2023 10:57 PM
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उत्तरकाशी टनल में पिछले 17 दिनों से जिंदगी से जंग लड़कर 41 मजूदरों की जीत हुई है। मंगलवार रात को रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा हो गया। सभी मजदूरों को सुरक्षित टनल से बाहर निकाल लिया गया। रेस्क्यू ऑपरेशन को पूरा करने के लिए वर्टिकल ड्रिलिंग, ऑगर मशीन और फिर मैनुअल खुदाई भी की गई।

रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान टनल में फंसे मजूदरों की जान बचाने को एक के बाद एक प्लान बनाया गया। भारी-भरकम अमेरिकन ऑगर मशीन के बाद ‘रैट माइनर्स’ की भी मदद ली गई थी। ऑगर मशीन द्वारा पाइपों को स्थापित करने के बाद रैट माइनिंग तकनीक से सुरग में फंसे लोगों को सकुलश रेस्क्यू किया गया। 

‘रैट माइनर्स’ ने रेस्क्यू अभियान में निभाई अहम भूमिक 
‘रैट माइनर्स’ का ग्रुप पाइप में सोमवार की रात घुसा था। मलबे में रेंग-रेंगकर आगे बढ़ते हुए सुरंग के अंदर खुदाई शुरू की थी। सुरंग के अंदर एक व्यक्ति ने खुदाई की तो दूसरे व्यक्ति ने मलबा ट्रॉली में डाला और तीसरे व्यक्ति ने ट्रॉली को एक शाफ्ट पर रखा। मलबे से भरी ट्रॉली को बाहर निकालकर रास्ता बनाया गया।

‘रैट माइनर्स’ ने सुरंग के अंदर लगातार खुदाई की। औसतन 0.9 मीटर प्रति घंटा खुदाई हुई। रेस्क्यू अभियान की मॉनिटरिंग कर रही एक अधिकारी ने बताया कि ‘रैट माइनर्स’के एक समूह को लगभग हर घंटे तीन दूसरे ‘रैट माइनर्स’ के से बदल दिया जाता था। मंगलवार दोपहर 3 बजे तक टनल के अंदर फंसे मजदूरों तक पहुंचने के लिए 12-13 मीटर की ड्रिलिंग हो चुकी थी। यूपी, और मध्य प्रदेश से कुल 12 ‘रैट माइनर्स’ को बचाव अभियान में शामिल किया गया था। 

उत्तरकाशी सुरंग से ऐसे बाहर निकले 41 मजदूर 
सुरंग के अंदर ड्रिलिंग हो जाने के बाद चौड़ी पाइपों को मलबे के माध्यम से धकेला गया था। एक बार ऐसा हो जाने के बाद, एनडीआरएफ की एक टीम, ऑक्सीजन किट पहने हुए, श्रमिकों के लिए व्हील-फिटेड स्ट्रेचर, एक रस्सी और ऑक्सीजन किट लेकर पाइप के अंदर से रेंगकर फंसे मजदूरों तक पहुंची थी। 

इसके बाद डॉक्टरों और पैरामेडिक्स को व्हील-फिटेड स्ट्रेचर पर अंदर भेजा गया, जिसके बाद उन्होंने फंसे हुए मजदूरों की जांच की। सभी मजदूरों को सुरंग के अंदर भेजी गई पाइप से बाहर निकाला गया। स्ट्रेचर को दोनों तरफ से रस्सियों को भी बांधा गया था। एक-एक कर टनल के अंदर से सभी मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाला गया। पाइप की दूसरी ओर खड़े एनडीआरएफ के जवानों ने स्ट्रेचर को खींचकर मजदूरों को सकुशल बाहर निकाला।  

 

टनल के अंदर फंसे मजदूरों को ऐसे भेजा खाना और जरूरी सामान
उत्तरकाशी टनल में पिछले 17 दिनों से फंसे 41 लोगों की जान बचाने के लिए रेस्क्यू अभियान युद्धस्तर पर चलाया गया। टनल के अंदर फंसे मजदूरों के लिए खाना और जरूरी सामान भी भेजा गया था। टनल के अंदर 6 इंच की पाइप 20 नवंबर को स्थापित की गई थी। पाइप के माध्यम से फंसे मजदूरों के लिए दाल, चावल, रोटी, फल आदि भेजे गए थे। इससे पहले मजदूरों की जान बचाने को दूसरी पाइप के जरिए चने आदि भी भेजे गए थे।  

ऑगर मशीन की भी रही अहम भूमिका
उत्तरकाशी टनल रेस्क्यू अभियान में अमेरिकन ऑगर मशीन ने अहम भूमिका निभाई थी। ऑगर मशीन में एक पेचदार पेंच जैसा ब्लेड होता है, जिसे बरमा बिट के रूप में जाना जाता है। घूम-घूमकर मशीन छेद बनाते हुए आगे का रास्ता बनाती है। ऑगर मशीन ने शुक्रवार को टूटने से पहले 55 मीटर तक ड्रिल किया था।

सिल्क्यारा सुरंग ऑपरेशन में अमेरिकन ऑगर 600-1200, उच्च शक्ति वाली हॉरिजंटल ड्रिलिंग का इस्तेमाल किया गया था। इसका निर्माण ट्रेंचलेस तकनीक में विशेषज्ञता वाली अमेरिकी कंपनी अमेरिकन ऑगर्स द्वारा किया गया है। मशीन 5 फीट से लेकर 10 फीट व्यास तक के छेद कर सकती है। ड्रिलिंग के दौरान बरमा मशीनों द्वारा लाए गए मलबे या सामग्री को आमतौर पर बरमा के डिजाइन का उपयोग करके हटा दिया जाता है।

बरमा में एक पेचदार पेंच जैसा ब्लेड होता है जो न केवल ड्रिल करता है बल्कि घूमते समय खोदी गई सामग्री को छेद से बाहर निकालने का काम भी करता है। मशीन से एक मीटर ड्रिल करने में एक घंटा और पाइप में फिट करने में चार से पांच घंटे का समय लगा था। सिल्क्यारा टनल रेस्क्यू ऑपरेशन में 900 मिमी और 800 मिमी पाइप, जो छह फीट लंबे थी, इस मशीन के सहारे स्थापित की गई थी। पाइप के दोनों टुकड़ों को बाद में वेल्डिंग के जरिए जोड़ा गया था।  

 

 

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