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कड़वा अतीत छोड़ उत्तरकाशी मिशन बना मिसाल, उत्तराखंड में सुरंग हादसे में पहले भी जा चुकी जान

उत्तरकाशी सिलक्यारा टनल हादसा 17वें दिन जाकर कामयाब हो पाया। इस अभियान में राज्य से लेकर केंद्र की एजेंसियों के समय रहते मोर्चा संभालने से बड़ी कामयाबी हाथ आई। 41 लोगों को बाहर निकला लिया गया।

कड़वा अतीत छोड़ उत्तरकाशी मिशन बना मिसाल, उत्तराखंड में सुरंग हादसे में पहले भी जा चुकी जान
Himanshu Kumar Lallउत्तरकाशी, हिन्दुस्तानWed, 29 Nov 2023 05:41 PM
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उत्तराखंड में टनल हादसों में राहत एवं बचाव कार्य का पुराना इतिहास बहुत बेहतर नहीं रहा है। इन सबको पीछे छोड़ इस बार उत्तरकाशी मिशन  सिलक्यारा पूरी तरह सफल रहा। टनल अभियान में 16 दिन बाद जाकर सफलता मिली। सभी 41 मजदूरों को बचा कर एक लंबी लकीर खींची गई।  

उत्तरकाशी सिलक्यारा टनल हादसा 17वें दिन जाकर कामयाब हो पाया। इस अभियान में राज्य से लेकर केंद्र की एजेंसियों के समय रहते मोर्चा संभालने से बड़ी कामयाबी हाथ आई। सुरंग में फंसे 41 लोगों में से सभी को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। ये अभियान की बड़ी सफलता रही। जबकि पूर्व में उत्तराखंड में जो भी टनल हादसे हुए, वहां बड़ी संख्या में लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी।

दिवाली के दिन 12 नवंबर को हुए हादसे के बाद 13 नवंबर से श्रमिकों तक सरकार ने खाने और पीने का इंतजाम कर दिया था। यही इस अभियान की सबसे बड़ी सफलता रही। सिलक्यारा उत्तरकाशी में घटना के कुछ घंटों के भीतर सरकारी सिस्टम मौके पर पहुंच गया था। हालांकि बचाव अभियान 48 घंटे बाद ही शुरू हो पाया था, लेकिन आपूर्ति समय पर शुरू हो गई थी।

इसके कारण सुरंग के भीतर श्रमिकों का हौसला बना रहा। पाइप के सहारे ही पहले श्रमिकों से बातचीत तक हुई। इससे उनमें हिम्मत और बढ़ती चली गई। यही इस अभियान की सफलता की सबसे बड़ी वजह रही। उत्तराखंड में टनल हादसों का रहा पुराना इतिहास: टिहरी बांध में दो अगस्त 2004 की रात को टनल टी थ्री के धंसने से बड़ा हादसा हुआ।

इस हादसे में 29 लोगों की जान गई। इसी तरह सात फरवरी 2021 को चमोली के रैणी ऋषि गंगा में आई बाढ़ के कारण रैणी ऋषि गंगा परियोजना में काम करने वाले 105 लोगों की मौत हो गई थी। यहां भी टनल में फंसने से मौत हुई थी। टनल खोलने में तीन दिन का समय लगा। इस हादसे में टनल में फंसे 105 लोगों के शव तो मिल गये थे जबकि 204 लोग लापता हो गए थे। 

देश-दुनिया के सफल रेस्क्यू में अब सिलक्यारा भी शामिल 
उत्तरकाशी में 41 श्रमिकों को 17वें दिन सकुशल रेस्क्यू किए जाने के साथ ही सिलक्यारा देश-दुनिया के बड़े बचाव अभियानों में शामिल हो गया। यहां देश की आपदा राहत टीमों ने अपनी योग्यता और क्षमता का लोहा मनवाया। यह देश का अभी तक का सबसे सफल रेस्क्यू अभियान माना जा रहा है। इस अभियान के दौरान हमारे संसाधन, आपदा प्रबंधन और इंजीनियरिंग कौशल को कड़ी परीक्षा से गुजरना पड़ा। 

थाईलैंड गुफा हादसा: 23 जून 2018 को वाइल्ड बोअर्स फुटबॉल टीम के 12 खिलाड़ी और कोच थाईलैंड की थाम लुआंग नांग नॉन गुफा के परिसर की तलाश कर रहे थे। भारी बारिश से सुरंगों में पानी भर गया। इन सबको केटामाइन दवा से बेहोश करके एक-एक कर गुफा से बाहर निकला गया था। अभियान दो सप्ताह चला।

बंगाल खदान हादसा: 13 नवंबर 1989 को पश्चिम बंगाल के रानीगंज की कोयला खदान में 220 मजदूर काम कर रहे थे, तभी अचानक बाढ़ आ गई। दो लिफ्ट से मजदूरों को बाहर निकाला जाने लगा। इस बीच लिफ्ट के शॉफ्ट में पानी भर गया और 71 मजदूर फंस गए। टीन की चादर का कैप्सूल बनाकर तीन दिन बाद 65 मजदूरों को सकुशल निकाल लिया गया, लेकिन छह श्रमिक डूबने के कारण जान गंवा चुके थे।

बोरवेल हादसा: हरियाणा में कुरुक्षेत्र के हल्ढेरी गांव में 60 फीट गहरे बोरवेल में पांच साल का मासूम प्रिंस गिर गया था। इसके बाद तीन फीट व्यास वाले पाइप का इस्तेमाल कर करीब 50 घंटे की कड़ी मशक्कत के वह सुरक्षित बाहर निकला। 

चिली खदान हादसा: पांच अगस्त 2010 का चिली खनिकों का बचाव अभियान भी खूब चर्चा में रहा था। वहां खदान ढहने से 33 श्रमिक दब गए। बचाव टीम को 22 अगस्त को सफलता मिली, जब उसे सतह से नीचे सुराख करने में कामयाबी मिली। 69 दिन बाद 33 खनन कर्मियों को चिली के राष्ट्रीय ध्वज के रंग में रंगे कैप्सूल के जरिए एक-एक कर बचाते देखा गया।

ऑस्ट्रेलिया का खदान हादसा: 25 अप्रैल 2006 को भूकंप के कारण दो ऑस्ट्रेलियाई मजदूर सोने की खदान में जमीन के नीचे करीब एक किलोमीटर अंदर फंस गए। पांच दिन बाद थर्मल कैमरों का इस्तेमाल किया तो दोनों के जीवित होने का पता चला। 14 दिनों के बाद ये लोग खदान से बाहर आ पाए।

चीन में सात दिन तक खदान में फंसे रहे 113 मजदूर: 2010 में चीन के शांक्सी प्रांत की कोयला खदान से 115 मजदूरों को सात दिन बाद बाहर निकाला जा सका था। खदान में 153 श्रमिक फंसे हुए थे, जिनमें से 23 की मौत हो गई थी। जबकि, 15 का कभी पता ही नहीं चल पाया। भोजन के अभाव में चीड़ के खंभों की छाल खाते थे।


 

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