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उत्तराखंड लोकसभा चुनाव 2024 में मतदान का बहिष्कार, मतदाताओं ने बताया-सड़क नहीं होना वजह 

ग्रामीण 32 साल से दांवापुल-बैरावा मोटर मार्ग के चौड़ीकरण, सुधारीकरण की मांग कर रहे हैं। इसके लिए कई बार आंदोलन हो चुके हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क निर्माण तो दूर उन्हें कोई आश्वासन नहीं मिला।

उत्तराखंड लोकसभा चुनाव 2024 में मतदान का बहिष्कार, मतदाताओं ने  बताया-सड़क नहीं होना वजह 
Himanshu Kumar Lallचकराता, हिन्दुस्तानSat, 20 Apr 2024 10:18 AM
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उत्तराखंड लोकसभा चुनाव 2024 के लिए 19 अप्रैल को मतदान  हुआ। लेकिन, मतदाताओं ने अपनी मांग को लेकर मतदान का बहिष्कार किया। मतदाताओं का कहना था कि सड़क नहीं तो वोट नहीं। कहा सड़क की मांग को लेकर कई बार ज्ञापन भी सौंपा गया है, लेकिन सालों से उनकी मांग पूरी नहीं हो पा रही है। 

चुनाव बहिष्कार से फैसले पर अडिग खत द्वार और विशलाड़ के ग्रामीणों को मनाने की कोशिशें नाकाम रहीं। सड़क न बनने से नाराज पंद्रह गांवों के चार हजार मतदाताओं ने चुनाव बहिष्कार किया। बूथों पर दिन भर पोलिंग पार्टियां मतदाताओं के इंतजार में बैठी रही।

ग्रामीण 32 साल से दांवापुल-बैरावा मोटर मार्ग के चौड़ीकरण, सुधारीकरण की मांग कर रहे हैं। इसके लिए कई बार आंदोलन हो चुके हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क निर्माण तो दूर उन्हें कोई आश्वासन तक नहीं मिला। जिसके बाद लोकसभा चुनाव बहिष्कार का फैसला लिया। ग्रामीण इसे मजबूरी में लिया गया मुश्किल फैसला बता रहे हैं।

जौनसार बावर में यह पहला मौका है जब यहां के पंद्रह गांवों के ग्रामीणों ने चुनाव में वोट नहीं दिए। द्वार में सात और विशलाड़ में आठ गांव शामिल हैं। शुक्रवार को भी अफसरों की टीम गांव पहुंची और ग्रामीणों से मतदान का आग्रह किया। कोई भी मतदाता, मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचा। यहां छह मतदेय स्थल बनाए गए थे।

मिंडाल निवासी विक्रम नेगी ने कहा,सरकारों ने उनके लिए काम नहीं किया। पिछले 32 सालों से मार्ग बनाने का मामला फाइलों में दबा हुआ है। कुराड़ निवासी मेहर सिंह का कहना है कि उनके दादा से लेकर वह इस मार्ग के निर्माण के आंदोलन में शामिल रह चुके हैं। लेकिन किसी ने मार्ग का निर्माण नहीं कराया। लिहाजा उन्हें चुनाव बहिष्कार का रास्ता चुनना पड़ा।

दादा से लेकर पोते तक सड़क के लिए कर चुके आंदोलन
मोहना की जिप सदस्य मीरा जोशी ने कहा कि वह ग्रामीणों के साथ खड़ी हैं। वे जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से मामले को लेकर मिल चुकी हैं। उनका दावा है कि निर्माण की स्वीकृति का आश्वासन मिला, लेकिन वित्तीय स्वीकृति नहीं मिली। जिससे ग्रामीणों में नाराजगी है।

मंझगांव के पूर्व प्रधान सुरेश प्रसाद थपलियाल का कहना है कि मार्ग पक्का नहीं हुआ। क्षेत्र की सुध नहीं लेने पर ग्रामीणों को यह फैसला लेना पड़ा। खत द्वार युवा संगठन अध्यक्ष राकेश भट्ट का कहना है कि तमाम आंदोलन के बाद भी मांग नहीं मानी गई। दादा से लेकर पोते तक आंदोलन कर चुके हैं।

मां का वोट डलवाने के लिए भटकी बेटी
गढ़ी इंटर कॉलेज में शुक्रवार को एक महिला अपनी मां के वोट के लिए भटकती रहीं। निशा खत्री की 86 वर्षीय मां कमलेश खत्री के पैर में दिक्कत है। वे वोट डालने बूथ तक नहीं आ पाईं। निशा ने बूथ पर मां के वोट के लिए निर्वाचन में लगे अफसरों से मदद मांगी।

लेकिन निराशा हाथ लगी। एक स्थानीय युवक की मदद से वो व्हील चेयर लेकर घर पहुंची और किसी तरह मां को बूथ तक पहुंचाया। आखिर कार बुजुर्ग ने वोट किया।

मोहितनगर में दोबारा वोट डालने पर आपत्ति
देहरादून। नगर निगम की निवर्तमान पार्षद अमिता सिंह ने आरोप लगाया कि विपक्ष के कुछ कार्यकर्ता मोहितनगर में मतदाताओं से दोबारा मतदान करवाने का प्रयास कर रहे थे। मतदाता के दोबारा वोट डालने के लिए आने पर उन्होंने विरोध शुरू कर दिया। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से भी अपना विरोध जताया। उन्होंने अधिकारियों से नियमों को ताक पर रखकर मतदान करने वालों के खिलाफ करने की मांग की।

क्यारा गांव के 550 मतदाताओं ने नहीं डाले वोट
टिहरी लोकसभा चुनाव में रायपुर विकासखंड के क्यारा गांव के करीब 550 मतदाताओं ने वोट नहीं किया। जिला प्रशासन के स्तर पर कई बार समझाने के बावजूद लोग घर से नहीं निकले। दरअसल, क्यारा गांव को पूर्व में टिहरी सांसद माला राज्यलक्ष्मी शाह ने गोद लिया था।

पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य विरेंद्र डोभाल ने बताया कि 2022 में सांसद ने क्यारा को धनोल्टी से जोड़ने को सड़क का शिलान्यास किया था, जो आज तक बनकर तैयार नहीं हुई है। इस बीच, जनप्रतिनिधियों ने भी आश्वासन दिए, लेकिन हालात नहीं बदले। बताया कि मालदेवता से 22 किमी दूर क्यारा गांव यदि धनोल्टी से जुड़ जाता तो आम लोगों को काफी राहत मिलेगी।

राजधानी से करीब होने के बाद भी अनदेखी हो रही है, लिहाजा ग्रामीणों ने चुनाव बहिष्कार का फैसला लिया। शुक्रवार को मतदान के दौरान उपजिलाधिकारी भी ग्रामीणों को मनाने पहुंचे। लेकिन, ग्रामीण किसी भी कीमत पर तैयार नहीं हुए।