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उत्तराखंड में कांग्रेस को क्यों मिली शिकस्त, विश्लेषकों ने बताई वजहें, कहां-कहां चूक?

उत्तराखंड लोकसभा चुनाव के नतीजों में कांग्रेस को लगातार तीसरी बार शिकस्त झेलनी पड़ी है। कांग्रेस की हार की कई वजहें बताई जा रही हैं। इस रिपोर्ट में जानें विश्लेषकों की नजर में कहां चूक गई कांग्रेस...

उत्तराखंड में कांग्रेस को क्यों मिली शिकस्त, विश्लेषकों ने बताई वजहें, कहां-कहां चूक?
congress leader rahul gandhi
Krishna Singhभाषा,देहरादूनWed, 05 Jun 2024 09:08 PM
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उत्तराखंड लोकसभा चुनाव के नतीजों में कांग्रेस को लगातार तीसरी बार शिकस्त झेलनी पड़ी है। साल 2014 और 2019 की तरह इस बार भी भाजपा ने पांचों सीट काफी मतों के अंतर से अपने नाम कीं। पौड़ी से अनिल बलूनी, टिहरी से महारानी माला राज्यलक्ष्मी शाह, हरिद्वार से त्रिवेंद्र सिंह रावत, अल्मोड़ा से अजय टम्टा और नैनीताल-उधमसिंह नगर से अजय भटट अपने निकटतम प्रतिद्वंदियों कांग्रेस के प्रत्याशियों पर शानदार जीत हासिल की। कांग्रेस की हार की कई वजहें बताई जा रही हैं। 

क्या रही वजहें?
1- देहरादून के एक राजनीतिक विश्लेषक ने कहा कि उत्तराखंड में प्रमुख कांग्रेस नेता चुनाव से दूर रहे। इससे पार्टी कार्यकर्ता उदासीन रहे। 

2- विश्लेषक बताते हैं कि कांग्रेस में कार्यकर्ताओं के उत्साह की कमी चुनाव की शुरुआत से ही साफ दिखी। 

3- यदि कांग्रेस ने ध्यान से प्रत्याशियों का चयन किया होता और ज्यादा मेहनत की होती तो वे भाजपा के किले में सेंध लगा सकते थे। 

4- चुनाव से पहले बदरीनाथ से कांग्रेस विधायक राजेंद्र भंडारी जैसे वरिष्ठ नेताओं के पार्टी छोड़ने से भी कार्यकर्ताओं का उत्साह घट गया और इसका असर उसकी चुनावी संभावनाओं पर पड़ा। 

5- भाजपा द्वारा किए गए प्रचंड चुनाव प्रचार के मुकाबले कांग्रेस के उत्साहहीन अभियान ने भी पार्टी की संभावनाओं पर असर डाला।

केवल प्रियंका गांधी ने की रैलियां
पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं में केवल प्रियंका गांधी ने ही उत्तराखंड में एक-दो चुनावी रैलियां की जबकि दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह, जेपी नडडा, योगी आदित्यनाथ सहित लगभग सभी स्टार प्रचारकों ने यहां जमकर प्रचार किया।

अलग हो सकती थी तस्वीर
राजनीतिक विश्लेषक मनमोहन भटट ने कहा कि यदि हरीश रावत ने अपने पुत्र के स्थान पर स्वयं चुनाव लड़ा होता तो वहां तस्वीर कुछ अलग हो सकती थी। भले ही कांग्रेस सीट हार गई लेकिन हरिद्वार में उसकी वोट हिस्सेदारी 2014 की तुलना में बढ़ी है जबकि भाजपा की गिरी है। हरिद्वार सीट पर 2014 में भाजपा की वोट हिस्सेदारी 58 फीसदी थी जो 2019 और 2024 में घटकर क्रमश: 52 और 50 प्रतिशत हो गई। इसके विपरीत इस अवधि में इस सीट पर कांग्रेस की वोट हिस्सेदारी 2014 से 2024 तक 34 प्रतिशत से बढ़कर 38 फीसदी हो गई।

हरिद्वार में क्यों हारी कांग्रेस?
राजनीतिक विश्लेषक मनमोहन भट्ट ने कहा कि यदि हरिद्वार में एक नए उम्मीदवार की जगह कोई अनुभवी प्रत्याशी होता तो वह पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा प्रत्याशी त्रिवेंद्र सिंह रावत को बेहतर टक्कर दे सकता था। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने हरिद्वार सीट पर प्रदेश कांग्रेस के कद्दावर नेता हरीश रावत के पुत्र और कांग्रेस प्रत्याशी वीरेंद्र रावत को 1,64,056 मतों के अंतर से हराकर पहली बार लोकसभा पहुंचने में सफल रहे।

इस बार कम रहा जीत का अंतर
मनमोहन भट्ट ने कहा कि इसी प्रकार, चकराता से छह बार के कांग्रेस विधायक प्रीतम सिंह और बाजपुर के विधायक यशपाल आर्य भी क्रमश: टिहरी और नैनीताल-उधमसिंह नगर सीट पर कांग्रेस के लिए बेहतर प्रत्याशी हो सकते थे। पौड़ी से पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल भी चुनाव हार गए लेकिन उन्होंने 2019 के मुकाबले इस बार भाजपा के विजय के अंतर को कम कर दिया।