DA Image
Saturday, November 27, 2021
हमें फॉलो करें :

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

हिंदी न्यूज़ उत्तराखंडफर्जी एमबीबीएस डिग्री से सरकारी डॉक्टर बन करता रहा मरीजों का इलाज, जानिए कैसे हुआ खुलासा

फर्जी एमबीबीएस डिग्री से सरकारी डॉक्टर बन करता रहा मरीजों का इलाज, जानिए कैसे हुआ खुलासा

देहरादून। चांद मोहम्मदHimanshu Kumar Lall
Sat, 23 Oct 2021 10:00 AM
फर्जी एमबीबीएस डिग्री से सरकारी डॉक्टर बन करता रहा मरीजों का इलाज, जानिए कैसे हुआ खुलासा

उत्तराखंड में रुड़की के उप जिला चिकित्सालय में तैनात चिकित्साधिकारी ने एमबीबीएस की फर्जी डिग्री लगाकर स्वास्थ्य विभाग में नौकरी पाई। जांच में दस्तावेज फर्जी मिलने के बाद स्वास्थ्य महानिदेशालय ने उसके खिलाफ रायपुर थाने में मुकदमा दर्ज करा दिया है। रायपुर थानाध्यक्ष अमरजीत रावत ने बताया कि मामले में डिप्टी रजिस्ट्रार उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल डॉ.डीडी चौधरी ने तहरीर दी है।

तहरीर में उन्होंने कहा है कि अनिल कुमार पुत्र प्रेमलाल नौटियाल निवासी लोअर नकरौंदा, देहरादून चिकित्सा अधिकारी के पद पर उपजिला चिकित्सालय रुड़की में तैनात है। उसने खुद को एससीबी मेडिकल कॉलेज कटक, उत्कल यूनिवर्सिटी, भुवनेश्वर से एमबीबीएस पासआउट बताते हुए काउंसिल में पंजीकरण कराया और बाद में रुड़की के सरकारी अस्पताल में नौकरी पा ली।

साथियों को संदेह होने पर उसकी एमबीबीएस की डिग्री की जांच की गई जो फर्जी पाई गई। उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल ने आरोपी की बर्खास्तगी को लेकर शासन को प्रस्ताव भेज दिया है। एसओ रायपुर ने बताया कि आरोपी के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। 

साथी डॉक्टरों के शक से खुली फर्जी डॉक्टर की पोल
रुड़की के सरकारी अस्पताल में तैनात फर्जी डॉक्टर के मामले का खुलासा, साथी डॉक्टरों के शक के आधार पर हो सका। उसकी गतिविधियों को देखते हुए डॉक्टरों ने विभाग से शिकायत की और जांच में मामले का खुलासा हो गया। आरोपी डॉक्टर ने खुद को एससीबी मेडिकल कॉलेज कटक, उत्कल यूनिवर्सिटी भुवनेश्वर से एमबीबीएस पासआउट बताते हुए उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल में अपना पंजीकरण कराया।

इसके बाद स्वास्थ्य विभाग में बतौर डॉक्टर नौकरी शुरू की। साथी डॉक्टरों को उसके कामकाज पर शक हुआ कि उसने मेडिकल की पढ़ाई नहीं की है। यह मामला उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल ऑफिस तक पहुंचा तो संबंधित यूनिवर्सिटी में डॉक्टर के दस्तावेज भेज कर रिपोर्ट मांगी गई।  वहां से रिपोर्ट भेजी गई कि उक्त दस्तावेज यूनिवर्सिटी से जारी नहीं किए। इस पर आरोपी डॉक्टर के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने को पुलिस को तहरीर दी गई। तहरीर पर पुलिस ने केस दर्ज कर जांच शुरू  कर दी है।

पंजीकरण के समय नहीं मिली थी रिपोर्ट
आरोपी अनिल कुमार का उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण करते वक्त दस्तावेज जांच के लिए संबंधित यूनिवर्सिटी को भेजे गए। वहां से उस वक्त कोई जवाब नहीं मिला। बिना जवाब आए ही अनिल  का बतौर डॉक्टर पंजीकरण कर लिया गया। अब दोबारा दस्तावेजों  की जांच कराई गई तो फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ।  

सिस्टम पर सवाल, मरीजों की जान से खिलावाड़
रुड़की सिविल अस्पताल में तैनात डॉक्टर की फर्जी एमबीबीएस डिग्री पूरे सिस्टम पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। साथ ही इस लापरवाही ने मरीजों की जान के साथ भी खिलवाड़ किया है। हैरानी की बात यह है कि डॉक्टर ने शुरुआत में अस्पताल में बतौर ईएमओ इमरजेंसी में सेवाएं दीं, जहां ज्यादातर मरीज गंभीर बीमार या घायल पहुंचते हैं।

काम के दौरान सहयोगियों को उनपर संदेह हुआ तो उनकी यहां से ड्यूटी हटाकर गैर चिकित्सकीय सेवाओं में लगाई गई। जानकारी के अनुसार, कोरोनाकाल में नई भर्ती प्रक्रिया के दौरान डॉक्टर की नियुक्ति हुई। फर्जी डॉक्टर की नियुक्ति के दौरान हर स्तर पर लापरवाही है। सूत्रों के अनुसार, 20 जून 2020 को उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल ने उड़ीसा मेडिकल काउंसिल को वेरिफिकेशन के लिए पत्र लिखा।

दरअसल, आरोपी का पहला पंजीकरण वहीं का था। आरोपी ने उड़ीसा की मार्च 2020 की एनओसी लगाई थी, लेकिन उड़ीसा मेडिकल काउंसिल से जवाब नहीं आया। हैरानी की बात है कि एनओसी के सत्यापन का इंतजार किए बिना ही उत्तराखंड में पंजीकरण कर दिया गया। जल्दी इतनी थी कि सत्यापन का पत्र भेजने के सात दिन बाद ही में पंजीकरण कर दिया गया। 27 जून 2020 में उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण किया गया।

इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आरोपी की पकड़ किस हद तक थी। हालांकि मामले में अब शासन जल्द आरोपी डॉक्टर की बर्खास्त कर सकता है। इस बाबत पूछने पर डिप्टी रजिस्ट्रार उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल डॉ. डीडी चौधरी ने बताया कि काउंसिल की ओर से स्वास्थ्य महानिदेशायल और शासन को आरोपी के खिलाफ कार्रवाई को लेकर लिखा गया है। 

सतर्कता से पकड़ा गया फर्जीवाड़ा
जब रुड़की में डॉक्टर अपनी क्षमता के अनुसार काम नहीं कर पाए तो शक हुआ। अस्पताल से एक गोपनीय पत्र मेडिकल काउंसिल और डीजी हेल्थ को भेजा गया। डेढ़ महीने पहले दोबारा पड़ताल के वक्त उड़ीसा काउंसिल के बजाय सीधे  उत्कल यूनिवर्सिटी भुवनेश्वर को सत्यापन के लिए दस्तावेज भेजे गए। जब यूनिविर्टी से भी जवाब नहीं आया तो रिमाइंडर भेजा गया। दोबारा जवाब आया तो बताया गया कि ऐसा कोई रिकॉर्ड उनके पास नहीं है। 

इंटरव्यू पर भी सवाल
सरकारी डॉक्टर की नियुक्ति के दौरान भर्ती प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है। इतना गंभीर पेशा होने के बावजूद डॉक्टर की तैनाती में घोर लापरवाही से कई सवाल उठ रहे हैं। चिंता की बात यह है कि डॉक्टर की तैनाती प्रशासनिक नहीं, बल्कि चिकित्सकीय सेवाओं में थी। इंटरव्यू के वक्त आखिर किस तरह के सवाल पूछे गए होंगे कि फर्जी डिग्री वाला भी नौकरी पा गया।

गोपनीय जांच ने होती तो शायद बच निकलता
आरोपी की बतौर चिकित्सा अधिकारी नियुक्ति के दौरान जिस स्तर पर लापरवाही हुई, उससे जाहिर है कि उसकी पकड़ काफी मजबूत थी। रुड़की सिविल अस्पताल से गोपनीय पत्र आने के बाद निदेशालय और काउंसिल में बेहद सतर्कता बरती गई। यहां तक की कई कर्मचारियों को भी पत्रचार की भनक नहीं लगने दी गई। आरोपी को शक न हो जाए इसलिए बड़ी चतुराई से जांच के लिए बुलाया गया। उसे कहा गया कि उसकी फाइल खो गई, इसलिए ऑरिजनल दस्तावेजों ले आएं। जांच की भनक लगते ही आरोपी के सेटिंग-गेटिंग से बच निकलने का डर था।

पहले आयुर्वेद अब एमबीबीएस डॉक्टर फर्जी निकला
देहरादून में हाल ही में चार प्राइवेट आयुर्वेद डॉक्टरों की डिग्री फर्जी पाई गई थी। भारतीय चिकित्सा परिषद उत्तराखंड ने चारों डॉक्टरों का पंजीकरण निरस्त कर दिया था। अब एमबीएस डॉक्टर की डिग्री फर्जी निकलने से राज्य में गिरोह सक्रिय होने की आशंका है। उधर, मेडिकल काउंसिल ने डीजीपी को भी पत्र लिखकर मामले की गहनता से जांच कराने की मांग की है।

सब्सक्राइब करें हिन्दुस्तान का डेली न्यूज़लेटर

संबंधित खबरें