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वो एक हादसा था...उत्तरकाशी सिलक्यारा सुरंग में अब काम करने से नहीं लगता कोई डर

सिलक्यारा टनल में तीन माह के सूनेपन के बाद अब श्रमिक धीरे-धीरे यहां काम पर लौट रहे हैं। बीते पांच फरवरी को बिहार, बाटा का रहने वाला बीरेंद्र भी यहां उन दो साथियों के साथ काम करने पहुंचे थे।

वो एक हादसा था...उत्तरकाशी सिलक्यारा सुरंग में अब काम करने से नहीं लगता कोई डर
Himanshu Kumar Lallउत्तरकाशी। प्रकाश रांगड़Sat, 17 Feb 2024 09:41 AM
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तीन माह पहले जिस चर्चित उत्तरकाशी की सिलक्यारा टनल में बिहार के बीरेंद्र खिस्को अपने 41 साथियों के साथ 17 दिन तक अंदर फंसे रहे, वही श्रमिक अब नया उत्साह और हिम्मत के साथ यहां काम करने पहुंचे हैं।

हादसे के बावजूद सुरंग के अंदर काम करने को लेकर उसमें कोई भय नजर नहीं आता। कहते हैं, वो एक हादसा था, जो जिंदगी में किसी के साथ भी हो सकता है...अब उसके बारे में सोचते रहना ठीक नहीं, काम चाहे यहां करो या कहीं और...करना तो है।

सिलक्यारा टनल में तीन माह के सूनेपन के बाद अब श्रमिक धीरे-धीरे यहां काम पर लौट रहे हैं। बीते पांच फरवरी को बिहार, बाटा का रहने वाला बीरेंद्र भी यहां उन दो साथियों के साथ काम करने पहुंचे, जो भूधंसाव हादसे के कारण अंदर फंस गए थे।

सुरंग के बाहर साथी श्रमिक के साथ खड़े बीरेंद्र मोबाइल फोन पर व्यस्त हैं। पूछने पर बताते हैं कि सुरंग में फिर से काम पर लौटे है। सुरंग हादसे में 17 दिन तक अंदर फंसे रहने के बावजूद उसमें काम पर लौटने का उत्साह और हिम्मत साफ नजर आया।

बीरेंद्र बताते हैं कि घरवालों ने यहां काम पर आने से इनकार किया था। कहा था कि कुछ और काम देख लो, लेकिन मैं यहां घरवालों को खूब समझाकर आया हूं। फौज का उदाहरण देते हुए कहता है कि सेना में जब कोई भर्ती होता है तो मां और घर के अन्य लोग उसे कभी ड्यूटी जाने से नहीं रोकते, जबकि वहां भी खतरा होता है।

बस यही सोचकर काम पर लौटा हूं और काम को लेकर कोई डर मेरे मन में अब नहीं है। अंदर फंसे कुछ मजूदर अब नहीं आ रहे हैं। कुछ मजदूरों में डर का माहौल भी है। जब अंदर फंसे थे तो डर तो लगा था। खाना मिलेगा कि नहीं, कहीं भूखे तो नहीं मर जाएंगे, ऐसे सोच पनपने लगी।

लेकिन तीन दिन दिक्कत में रहने बाद बराबर खाना मिलता रहा और हम उम्मीदों पर कायम हो गए। बता दें कि भूधंसाव के कारण 41 श्रमिकों के सुरंग के अंदर फंसने के बाद यहां काम करने वाले सभी श्रमिकों में डर का माहौल पैदा हो गया था, लेकिन अब जब एक बार फिर से सुरंग में काम चालू हुआ है तो ऐसे में श्रमिकों में काम करने का उत्साह और जज्बा वही नजर आ रहा है।

आर्थिक मदद से बनाया पक्का मकान
बीरेंद्र ने बताया कि सुरंग से बाहर निकलने के बाद सरकार और निर्माण कंपनी ने जो भी आर्थिक मदद और वेतन दिया, यहां से घर जाने के बाद पहले उन पैसों से पक्का मकान बनवाया। जो भी तीन-चार लाख रूपये मिले मकान के अलावा बच्चों के नाम पर एफडी करवाई है।

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