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Hindi News उत्तराखंडस्कूल में पढ़ने के लिए छात्र लगाते हैं 24 किमी की दौड़, छात्राएं भी पीछे नहीं 

स्कूल में पढ़ने के लिए छात्र लगाते हैं 24 किमी की दौड़, छात्राएं भी पीछे नहीं 

जीआईसी मंच में पढ़ने वाली सोनी, रितू, पुष्पा, सुमन समेत तमाम छात्र छात्राओं की हर सुबह हड़बड़ाहट के साथ शुरू होती है। इसके बाद सभी 12 किमी की दम फुला देने वाली खड़ी चढ़ाई पार कर अपने स्कूल पहुंचते हैं।

स्कूल में पढ़ने के लिए छात्र लगाते हैं 24 किमी की दौड़, छात्राएं भी पीछे नहीं 
Himanshu Kumar Lallचम्पावत। योगेश जोशी ‘योगी’ Wed, 22 Nov 2023 05:49 PM
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जीआईसी मंच में पढ़ने वाली सोनी, रितू, पुष्पा, सुमन समेत तमाम छात्र छात्राओं की हर सुबह हड़बड़ाहट के साथ शुरू होती है। इसके बाद सभी 12 किमी की दम फुला देने वाली खड़ी चढ़ाई पार कर अपने स्कूल पहुंचते हैं। यही वजह है कि इन्हें तड़के पांच बजे उठ कर स्कूल की तैयारी करनी पड़ती है और देर शाम ही ये अपने दुर्गम बकोड़ा गांव पहुंच पाते हैं।

चंपावत जिले में छात्रों को स्कूल जाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। बकोड़ा के विद्यार्थी शिक्षा का उजाला पाने के लिए अंधेरे में सफर करते हैं। यहां के छात्र छात्राएं स्कूल जाने को हर दिन 24 किमी का पैदल सफर तय करते हैं। उनका यह सफर तड़के छह बजे से शुरू हो कर शाम छह बजे तक चलता है।

कक्षा नौ में पढ़ने वाली रितु, सुमन और अंजली तड़के पांच बजे उठ जाती हैं। हाथ मुंह धोने और नाश्ता करने के बाद शुरू होता है 12 किमी खड़ी चढ़ाई पार करने का सफर। करीब दो घंटे पैदल चलने के बाद छात्र-छात्राएं जीआईसी मंच पहुंचते हैं। स्कूल से छुट्टी मिलने के बाद इन छात्र छात्राओं की एक बार फिर पैदल चलने की जद्दोजहद शुरू होती है।

12 किमी का तीखा ढलान पार कर अंधेरा घिरने पर ही छात्र छात्राएं वापस घर पहुंच पाते हैं। दिन में लंबी पैदल दूरी तय करने से निढाल पड़ चुके छात्र छात्राओं की पढ़ाई पर असर पड़ रहा है। 

घोड़े-खच्चर बने सामान ढोने का जरिया
सीमांत मोस्टा बकोड़ा के लिए घोड़े और खच्चर किसी वरदान से कम नहीं हैं। गहत, अदरक, गडेरी, हल्दी, सरसों समेत तमाम उत्पादों को सड़क तक पहुंचाने के लिए घोड़े और खच्चरों का सहारा लिया जाता है। हालांकि सामान ढुलान करने में ग्रामीणों को बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है। बीमार, बुजुर्ग और गर्भवती को सड़क तक पहुंचाना ग्रामीणों के लिए हमेशा टेढ़ी खीर साबित होता आया है।

छात्र बोले:
कक्षा दस में पढ़ने वाले विकास, मुकेश व पुष्पा, कक्षा 11 वीं की छात्रा सोनी, तनुजा और गोलू का कहना है कि हर रात सोते समय उन्हें अगले दिन पैदल सफर तय करने की चिंता सताती हैं। वे बताते हैं कि तड़के और शाम को घने जंगल के बीच गुजरने के दौरान जानवरों का खतरा भी लगातार बना रहता है। 

आजादी के सात दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी दूरस्थ मोस्टा बकोड़ा गांव सड़क से नहीं जुड़ सका है। सड़क के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। अब डीएम के दौरे से सड़क बनने की आस जगी है। 
रजनी बोहरा, बीडीसी सदस्य, रियांसी बमनगांव

सीमांत मोस्टा बकोड़ा में सड़क निर्माण की कार्यवाही अंतिम चरण में है। सड़क निर्माण प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए लोनिवि के अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं। शीघ्र स्वीकृति मिले इसके लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं।
नवनीत पांडेय, डीएम, चम्पावत।


 

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