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Hindi News उत्तराखंडतंग जगह, कम ऑक्सीजन में भी नहीं मानी हार; ये हैं सिलक्यारा टनल के 'संकटमोचन'

तंग जगह, कम ऑक्सीजन में भी नहीं मानी हार; ये हैं सिलक्यारा टनल के 'संकटमोचन'

सिलक्यारा टनल में फंसे 41 मजदूरों को 17वें दिन बाहर निकाल लिया गया है। पिछले 16 दिन से मजदूरों को निकालने के लिए बचावदल काफी कोशिश कर रहा था। भूमिगत सुरंग विशेषज्ञ ने बड़ी बाधा को दूर किया था।

तंग जगह, कम ऑक्सीजन में भी नहीं मानी हार; ये हैं सिलक्यारा टनल के 'संकटमोचन'
Sneha Baluniलाइव हिन्दुस्तानॉ,उत्तरकाशीTue, 28 Nov 2023 10:46 PM
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उत्तरकाशी की सिलक्यारा टनल में पिछले 16 दिन से फंसे 41 मजदूरों के लिए मंगलवार 'मंगल' घड़ी लेकर आया। 17वें दिन सभी बचावकर्मियों की कोशिश रंग लाई और आखिरकार उन्हें टनल से बाहर निकाल लिया गया। 12वें दिन भी पूरे देश को लग रहा था कि मजदूर बाहर आ जाएंगे लेकिन मेटल गार्टर, लोहे की रॉड सबसे बड़ी बाधा के तौर पर सामने आई। तब मानवीय हस्तक्षेप ही एकमात्र विकल्प बचा था। आगे बढ़ने के लिए जरूरी था कि कोई संकीर्ण पाइपों के अंदर प्रवेश करे और गैस कटर की मदद से बाधा बन रहे मेटल को काटे।

द इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए, ट्रेंचलेस इंजीनियरिंग के भूमिगत सुरंग विशेषज्ञ प्रवीण यादव ने उस दिन को याद किया जब एनडीआरएफ की टीम सहित कई लोगों ने अंदर जाने की कोशिश की, लेकिन ब्लोअर और पर्याप्त ऑक्सीजन आपूर्ति के अभाव में, वे असफल रहे। यादव ने कहा, 'जब कुछ और काम नहीं आया, तो मैं (सहायक और साथी बलिंदर यादव के साथ) अंदर जाने के लिए तैयार हो गया, लेकिन मेरे बॉस ने मुझे एनडीआरएफ कर्मियों की कोशिशों का इंतजार करने के लिए कहा। लेकिन वे जवान आकार में बड़े थे और पाइप बहुत छोटे थे। बाद में, मेरे अंदर जाने का समय आया। मैंने गैस कटर और दो पानी की बोतल लीं, और अपने घुटनों और कोहनियों का उपयोग करके पाइप के जरिए रेंगता हुआ चला गया।'

उन्होंने कहा, 'इस प्रक्रिया में अपने हाथों से मेटल के गार्डर ढूंढना, उन्हें गैस कटर से काटना और मेटल के टुकड़े को निकालना शामिल था। इस सब से बहुत अधिक गर्मी पैदा हुई और हम पर झुलसने का खतरा मंडरा रहा था। उस तंग जगह के अंदर जाना अपने आप में कठिन है, लेकिन अंदर घंटों तक गैस कटर का उपयोग करना बिल्कुल अलग लेवल का है जिसे बयां नहीं किया जा सकता। यह सहनशक्ति और अनुभव का खेल है।'

यादव ने याद करते हुए बताया कि गैस कटर का उपयोग करते समय चिंगारी उनके चेहरे और शरीर पर लग रही थी, लेकिन उनके पास एक सुरक्षा जैकेट, दस्ताने, चश्मा और एक हेलमेट था। उन्होंने कहा, 'इसके अलावा, यदि आप अनुभवी हैं, तो आप जानते हैं कि किस कोण पर मेटल को काटना है ताकि खतरा कम से कम हो। ड्रिलिंग में ज्यादा बाधाएं आने के कारण, वह दिन में दो-तीन बार अंदर जा रहे थे।'

जब से वह अमेरिकी ऑगर मशीन के साथ टनल साइट पर पहुंचे, तब से वह और उनके सहयोगी बिना किसी जरूरी रुकावट के सुरंग के अंदर 16-18 घंटे बिता रहे थे। यादव ने कहा, 'जिन दिनों मैं रेस्क्यू में बाधा बन रहे मेटल की रुकावटों को काट रहा था और उनके टुकड़ों को ठंडा होने के बाद हटा रहा था। मैं जब भी बाहर निकलता पसीने से पूरी तरह लथपथ होता। यहां तक कि मेरे जूते भी पसीने से भर गए थे। जैसे ही मुझे हवा का झोंका महसूस हुआ, वह किसी अद्भुत अहसास से कम नहीं लग रहा था। लोगों ने मेरी सराहना की और मेरे लिए तालियां बजाईं, लेकिन मैं उस पल केवल नहाना और सोना चाहता था।'

उन्होंने कहा, 'मुझे लगा कि अंदर फंसे लोग मेरे जैसे ही मजदूर हैं। मैं भूमिगत सुरंगों में काम करता हूं और किसी दिन यहां मैं भी फंसा हो सकता हूं। फिर कोई और मेरी मदद करेगा जैसे मैंने इस ऑपरेशन में मदद की।' बचाव अभियान समाप्त होने के बाद उनकी योजनाओं के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि वह पिकनिक पर जाना चाहते हैं, लेकिन शायद वह पहले असम जाएंगे जहां उन्हें 400 मीटर की नदी पार (रिवल क्रॉसिंग) परियोजना पर काम शुरू करना होगा।

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