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हिंदी न्यूज़ उत्तराखंडदो ब्लैकहोल वाली दुर्लभ आकाशगंगा मिली-10 लाख करोड़ सूर्य के बराबर रोशनी, क्या होगा पृथ्वी को खतरा? 

दो ब्लैकहोल वाली दुर्लभ आकाशगंगा मिली-10 लाख करोड़ सूर्य के बराबर रोशनी, क्या होगा पृथ्वी को खतरा? 

नैनीताल। दीपक पुरोहितHimanshu Kumar Lall
Sun, 28 Nov 2021 05:30 PM
दो ब्लैकहोल वाली दुर्लभ आकाशगंगा मिली-10 लाख करोड़ सूर्य के बराबर रोशनी, क्या होगा पृथ्वी को खतरा? 

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भारतीय खगोलविदों ने पांच अरब प्रकाश वर्ष दूर स्थित दो ब्लैकहोल की अवस्था वाली एक नई सक्रिय व दुर्लभ आकाशगंगा को खोजा है। इसमें सामान्य से दस गुना अधिक एक्स-रे उत्सर्जन देखा गया। इससे दस लाख करोड़ सूर्य के बराबर प्रकाश उत्पन्न हो रहा है। इसका नाम ओजे 287 है। यह खोज ब्रह्मांड की शुरुआत में आकाशगंगाओं के निर्माण, पारस्परिक प्रभाव और विकास में उच्च गुरुत्वाकर्षण और पदार्थ के त्वरण की भूमिका का अध्ययन करने में मदद कर सकती है। 

नैनीताल स्थित आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) के खगोल वैज्ञानिक डॉ. पंकज कुशवाह के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की टीम ने इस बेहद दुर्लभ खोज को अंजाम दिया। डॉ. पंकज ने बताया कि 2015 से ही ओजे 287 नामक एक ऐसे ब्लैक होल स्रोत की निगरानी कर रहे हैं, जिसकी खासियत थी कि यह स्रोत लगभग हर 12 वर्षों में बार-बार अपनी ऑप्टिकल चमक में बढ़त दिखाता है।

स्रोत ने 2018 के मध्य से धीरे-धीरे अपने स्पेक्ट्रल व्यवहार को बदलते हुए 2020 में स्पेक्ट्रल की नई अवस्था को पा लिया। ऑप्टिकल चमक में बार-बार होने वाली बढ़त इसे बेहद दुर्लभ बनाती है। वैज्ञानिक का मानना है कि इसकी वजह इस आकाशगंगा में दो ब्लैकहोल होना है। 

एक आकाशगंगा में दो ब्लैकहोल बेहद दुर्लभ
किसी आकाशगंगा में दो ब्लैक होल होना बेहद दुर्लभ बात है। लाखों तारों व आकाशगंगाओं के अध्ययन के बाद भी दुनिया भर के वैज्ञानिक केवल कुछ ही मामलों में दो ब्लैक होल खोज पाए हैं। इसलिए यह खेाज खुद में काफी महत्वपूर्ण है। इससे अंतरिक्ष और तारों के निर्माण व विस्तार से जुड़े कई सवालों के जवाब खोजने में मदद मिलेगी।

नासा के उपग्रहों से भी मदद ली
इस अध्ययन में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला अहमदाबाद द्वारा संचालित नियर इंफ्रारेड बैंड्स में माउंट आबू ऑब्जर्वेशन फैसिलिटी की जमीन से संचालित सुविधा और अंतरिक्ष में मौजूद नासा के उपग्रहों की भी मदद ली गई। ऑप्टिकल, अल्ट्रावॉयलेट और एक्स-रे देखने के लिये नील्स गेरेल स्विफ्ट उपग्रह और फर्मी उपग्रह का इस्तेमाल किया गया।

अध्ययन में प्रमुख शोधकर्ता डॉ. पंकज कुशवाहा के साथ-साथ एआरआईईएस के प्रोफेसर आलोक सी गुप्ता, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के डॉ. मेन पाल, साओ पाउलो ब्राजील विश्वविद्यालय से प्रोफेसर एलिसाबेशी एम डे गौविया डेल पीनो, निबेदिता कलिता, एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्ज़र्वेटरी चीन के प्रो मिनफेंग गु शामिल रहे। 

 

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