ट्रेंडिंग न्यूज़

Hindi News उत्तराखंड64 साल का हो गया उत्तराखंड का पिथौरागढ़ जिला, कभी पैदल चलना पड़ता था और आज हवाई सफर

64 साल का हो गया उत्तराखंड का पिथौरागढ़ जिला, कभी पैदल चलना पड़ता था और आज हवाई सफर

सड़क मार्ग हो या फिर हवाई, दोनों में ही जिले ने प्रदेश स्तर पर एक नई मिसाल पेश की है। जिला गठन से पूर्व यहां के लोग पैदल ही आवाजाही करते थे, वर्तमान में शहर से लेकर गांवों तक सड़कों का जाल बिछा है।

थालीसैन
1/ 2थालीसैन
2/ 2
Himanshu Kumar Lallपिथौरागढ़। संतोष आर्यनSat, 24 Feb 2024 04:48 PM
ऐप पर पढ़ें

नेपाल, चीन सीमा पर बसा सीमांत जिला आज 64 वर्ष का हो जाएगा। 24 फरवरी 1960 को आज के ही दिन अल्मोड़ा से अलग होकर पिथौरागढ़ एक अलग जनपद के तौर पर अस्तित्व में आया था। इन छह दशकों में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बसे इस जिले में कई सारे विकास कार्य हुए, विशेषकर परिवहन के क्षेत्र में।

सड़क मार्ग हो या फिर हवाई, दोनों में ही जिले ने प्रदेश स्तर पर एक नई मिसाल पेश की है। जिला गठन से पूर्व यहां के लोग पैदल ही आवाजाही करते थे, लेकिन वर्तमान में शहर से लेकर गांवों तक सड़कों का जाल बिछा है।

ऑलवेदर सड़क बनने से लोगों की आवाजाही आसान हुई है। इन दिनों विमान से लेकर हेली सेवा भी यहां संचालित हो रही है। लोग चंद मिनटों में ही एक से दूसरे क्षेत्र पहुंच रहे हैं। हालांकि जिले के कुछ गांव ऐसे भी हैं, जिनके लिए सड़क आज भी सपना बना हुआ है।

लोग पूर्व की तरह ही पैदल राशन ढोकर घर तक पहुंचाते हैं। जिला गठन के बाद पर्यटन के क्षेत्र में जिले को नई पहचान मिली है। देश के विभिन्न राज्यों से लेकर विदेश से भी लोग यहां पहुंच रहे हैं। गंगोलीहाट के पाताल भुवनेश्वर से लेकर चौकोड़ी, मुनस्यारी और धारचूला में पर्यटकों से गुलजार रहते हैं।

स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में अब भी सुधार की जरूरत
पिथौरागढ़ जिले में स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में पूर्व की अपेक्षा विकास तो हुआ है, लेकिन अभी भी सुधार की बेहद जरूरत है। जिले भर में 59 से अधिक छोटे-बड़े अस्पताल हैं, लेकिन विशेषज्ञ चिकित्सक व पर्याप्त स्टाफ न होने से लोगों को इलाज नहीं मिल रहा है। करोड़ों की लागत से बना बेस अस्पताल भी शोपीस बना हुआ है। लोग आज भी इलाज के लिए मैदानी क्षेत्रों के अस्पताल पर निर्भर हैं।

पलायन एक बड़ी समस्या, 59 गांव हुए वीरान
पिथौरागढ़ जिला के गठन के बाद सरकारी तंत्र के लिए पलायन एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है। सुविधाओं के अभाव में लगातार गांव के गांव खाली हो रहे हैं। प्रशासन के मुताबिक बीते कुछ वर्षों में जिले के 59 गांव वीरान हो गए हैं। यानि की इन गांवों में एक भी व्यक्ति नहीं रहता है। गांव छोड़कर शहर जाने वाले लोगों का सिलसिला अब भी जारी है।

हुनर से राष्ट्रीय फलक पर छोड़ी छाप
सीमांत के खिलाड़ी एशियन गैम्स, कॉमनवेल्थ से लेकर कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग, जिम्नास्ट, हॉकी सहित अन्य खेल प्रतियोगिताओं में प्रदेश और देश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। अब तक करीब 13 से अधिक लोगों को देश के प्रतिष्ठित पुरस्कार पद्म भूषण, पद्मश्री, द्रोणाचार्य व अर्जुन पुरस्कार मिल चुका है।

भू-वैज्ञानिक खड़क सिंह वल्दिया पद्म भूषण से सम्मानित हुए हैं। पद्मश्री पुरस्कार पाने वालों में पर्वतारोही हरीश चंद्र सिंह रावत, हुकुम सिंह पांगती, भू-वैज्ञानिक वल्दिया, पर्वतारोही लवराज धर्मशक्तू, सामाजिक कार्यकर्ता बसंती देवी शामिल हैं।

हंसा मनराल शर्मा, अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षक भाष्कर भट्ट को द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित हुए। बास्केटबाल खिलाड़ी हरिदत्त कापड़ी, पर्वतारोही पद्मश्री हरीश चंद्र सिंह रावत, पर्वतारोही चंद्रप्रभा एतवाल, सुरेंद्र सिंह वल्दिया को अर्जुन पुरस्कार मिला है।

इसके अलावा बॉक्सर दुर्योधन सिंह नेगी, कविंद्र सिंह बिष्ट, नेहा कसन्याल, निवेदिता कार्की, निकिता चंद सहित कई खिलाड़ी अंतराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतने में कामयाब रहे हैं।

प्रमुख पर्यटन स्थल 
चंडाक, ध्वज, थलकेदार, ओम पर्वत, बेड़ीनाग, चौकोड़ी, डीडीहाट, मुनस्यारी, धारचूला, राष्ट्रीय उद्यान- अस्कोट वन्यजीव विहार

पिथौरागढ़ एक नजर
गठन 24 फरवरी 1960
क्षेत्रफल 7090 वर्ग किमी
जनसंख्या 483439
महिला 244133
पुरुष 239306
साक्षरता दर 82.2
महिला साक्षरता 72.3
पुरुष साक्षरता 92.7
तहसील 12
उपतहसील एक
ब्लॉक आठ
विधानसभा चार
गांवों की संख्या 1657 
नोट- आंकड़े वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार
 

हिन्दुस्तान का वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें