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भूस्खलन से अब नहीं जाएगी किसी की जान, नैनीताल-उत्तरकाशी समेत इन जिलों के लिए बना प्लान 

उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से बुधवार को भूस्खलन न्यूनीकरण तथा जोखिम प्रबंधन पर कार्यशाला का आयोजन किया गया जिसमें शांतनु सरकार ने कहा कि हेलीकॉप्टर और ड्रोन से सर्वे होगा।

भूस्खलन से अब नहीं जाएगी किसी की जान, नैनीताल-उत्तरकाशी समेत इन जिलों के लिए बना प्लान 
Himanshu Kumar Lallदेहरादून, हिन्दुस्तानThu, 13 Jun 2024 10:21 AM
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उत्तराखंड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र के निदेशक शांतनु सरकार ने कहा कि नैनीताल, अल्मोड़ा, उत्तरकाशी और चमोली में भूस्खलन जोन चिह्नित करने के लिए लिडार सर्वे कराया जाएगा। इस सर्वे के आधार पर इन शहरों में भूस्खलन जोन के ट्रीटमेंट कार्य कराए जाएंगे।

उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से बुधवार को भूस्खलन न्यूनीकरण तथा जोखिम प्रबंधन पर कार्यशाला का आयोजन किया गया जिसमें शांतनु सरकार ने कहा कि हेलीकॉप्टर और ड्रोन के माध्यम से नैनीताल, उत्तरकाशी, चमोली और अल्मोड़ा शहरों का लिडार सर्वे होगा।

उन्होंने कहा कि यह सर्वे जल्द कराया जाएगा और इससे मिलने वाले डेटा का उपयोग विभागों के साथ साझा किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इससे इन शहरों में सुरक्षित निर्माण कार्यों के साथ ही भूस्खलन संभावित क्षेत्रों का ट्रीटमेंट भी किया जा सकेगा।

उन्होंने कहा कि सर्वे का उपयोग भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में रॉक फॉल टनल बनाकर यातायात को सुचारु बनाए रखने में भी उपयोग किया जा सकेगा। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग के वैज्ञानिक डॉ. सुरेश कन्नौजिया ने इस दौरान बताया कि नासा-इसरो सार मिशन (निसार इसी साल लांच होगा।

इस तकनीक की आपदा प्रबंधन में बड़ी उपयोगिता होगी। इससे भूस्खलन न्यूनीकरण के लिए भू-संरचना तथा स्लोप पैटर्न में आ रहे बदलावों को समझा जा सकेगा।

क्या है लिडार तकनीकी
लिडार तकनीक पृथ्वी की सतह की जांच करने का एक तरीका है। इससे जमीन के बारे में जानकारी हासिल की जा सकती है। इससे किसी वस्तु की भू-स्थानिक श्रृंखला का विवरण प्राप्त किया जा सकता है। यह एक तरह की लेजर स्कैनिंग है और जमीन की स्थिति का इससे आंकलन किया जा सकता है।

विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी सिन्हा
सचिव आपदा प्रबंधन डॉ. रंजीत सिन्हा ने कहा कि राज्य में भूस्खलन एक गंभीर समस्या है। उन्होंने कहा कि भूस्खलन या किसी अन्य आपदा का सामना करने के लिए पुख्ता तैयारी और समग्र दृष्टिकोण की जरूरत है। कहा कि सड़क काटने के बाद एक पुश्ता लगाने भर से काम नहीं चलेगा। बल्कि हमें वहां के भूविज्ञान को समझना होगा।

उन्होंने कहा कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की जरूरत है। पहाड़ों के ढलान विकास कार्य से डिस्टर्ब होने पर ट्रीटमेंट किया जाना अनिवार्य है। पहाड़ में होने वाले कार्य से पहले सॉयल बीयरिंग कैपेसिटी का अध्ययन भी जरूरी है। अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी यूएसडीएमए आनंद स्वरूप, यूएसडीएमए के अधिशासी निदेशक डॉ. पीयूष रौतेला आदि मौजूद रहे।

उत्तराखंड सबसे ज्यादा संवेदनशील निदेशक
कार्यशाला में वाडिया भूविज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. कालाचांद साई ने कहा कि हिमालयी राज्यों में उत्तराखंड भूस्खलन के लिहाज से सबसे ज्यादा प्रभावित और संवेदनशील है। उन्होंने कहा कि भूस्खलन की घटनाओं को कम करने के लिए सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों की मैपिंग की जानी जरूरी है और वह डाटा सिटी प्लानर्स को उपलब्ध करवाकर निर्माण कार्य सुरक्षित कराए जाने चाहिए।