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जागेश्वर धाम में भक्तों ने किया भोले का जलाभिषेक-VIDEO

जागेश्वर धाम

श्रावण मास के तीसरे सोमवार को सुबह से ही जागेश्वर धाम में श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगा रहा। भक्तों ने भगवान भोले का जलाभिषेक किया।

सोमवार को दूरदराज से आए लोगों ने जागनाथ, महामृत्युंजय, पुस्टि देवी, कुबेर, हनुमान आदि मंदिरो में जलाभिषेक  करते हुए मंदिर परिसर में पार्थिव पूजन किया और मेले का आनंद लिया। महिलाएं, बच्चे और बड़े-बुजुर्ग मेला परिसर में लगी दुकानों, फड़ों आदि से खरीदारी करने में व्यस्त रहे। सोमवार को आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं और बच्चे बड़ी संख्या में मेले का लुत्फ उठाने पहुंचे। लोगों का आना-जाना देर शाम तक जारी रहा। इधर सुबह से तेज बारिश  के बाद भी भक्तों की भीड़ लगी रही। भंडारे में लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया। दो किमी तक वाहनों की लंबी कतार लगी रही।

गौरतलब है कि उत्तराखंड के अल्मोड़ा से 35 किलोमीटर दूर स्थित जागेश्वर धाम के प्राचीन मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस क्षेत्र को सदियों से आध्यात्मिक जीवंतता प्रदान कर रहे हैं। यहां लगभग 250 मंदिर हैं, जिनमें से एक ही स्थान पर छोटे-बड़े 224 मंदिर स्थित हैं।

मंदिरों में गुप्त साम्राज्य की दिखाई पड़ती है झलक
उत्तर भारत में गुप्त साम्राज्य के दौरान हिमालय की पहाड़ियों के कुमाऊं क्षेत्र में कत्यूरी राजा थे। जागेश्वर मंदिरों का निर्माण भी उसी काल में हुआ। इसी कारण मंदिरों में गुप्त साम्राज्य की झलक भी दिखाई पड़ती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार इन मंदिरों के निर्माण की अवधि को तीन कालों में बांटा गया है। कत्यूरी काल, उत्तर कत्यूरी काल एवं चंद्र काल। बर्फानी आंचल पर बसे हुए कुमाऊं के इन साहसी राजाओं ने अपनी अनूठी कृतियों से देवदार के घने जंगल के मध्य बसे जागेश्वर में ही नहीं, अपितु पूरे अल्मोड़ा जिले में 400 से अधिक मंदिरों का निर्माण किया। इसमें से जागेश्वर में ही लगभग 250 छोटे-बड़े मंदिर हैं। मंदिरों का निर्माण लकड़ी तथा सीमेंट की जगह पत्थर की बड़ी-बड़ी शिलाओं से किया गया है। दरवाजों की चौखटें देवी-देवताओं की प्रतिमाओं से अलंकृत हैं। मंदिरों के निर्माण में तांबे की चादरों और देवदार की लकड़ी का भी प्रयोग किया गया है।

शिवजी तथा सप्तऋषियों ने यहां की थी तपस्या
पुराणों के अनुसार शिवजी तथा सप्तऋषियों ने यहां तपस्या की थी। कहा जाता है कि प्राचीन समय में जागेश्वर मंदिर में मांगी गई मन्नतें उसी रूप में स्वीकार हो जाती थीं, जिसका भारी दुरुपयोग हो रहा था। आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य जागेश्वर आए और उन्होंने महामृत्युंजय में स्थापित शिवलिंग को कीलित करके इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। शंकराचार्य जी द्वारा कीलित किए जाने के बाद से अब यहां दूसरों के लिए बुरी कामना करने वालों की मनोकामनाएं पूरी नहीं होती हैं। केवल यज्ञ एवं अनुष्ठान से मंगलकारी मनोकामनाएं ही पूरी हो सकती हैं।

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  • Web Title:many devotees came to jageshwar bham temple for jalabhishek on monday