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मकर संक्रांति:103 साल पहले ब्रिटिश हुकूमत से आम आदमी को मिली थी बड़ी राहत, इस प्रथा का हुआ था अंत

बागेश्वर में लगने वाले उत्तरायणी मेले का धार्मिक के साथ ही ऐतिहासिक महत्व भी है। उस दौर में राष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बडे़ आंदोलन की तैयारी चल रही थी। 103 साल पहले राहत मिली थी।

मकर संक्रांति:103 साल पहले ब्रिटिश हुकूमत से आम आदमी को मिली थी बड़ी राहत, इस प्रथा का हुआ था अंत
Himanshu Kumar Lallबागेश्वर, हिन्दुस्तानMon, 15 Jan 2024 12:10 PM
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मकर संक्रांति के दिन आज से 103 वर्ष पहले 1921 को उत्तराखंड के बागेश्वर के लोगों ने ब्रिटिश हुकूमत की ओर से थोपी गई कुली बेगार प्रथा का अंत कर दिया था। तब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने प्रभावित होकर इसे रक्तहीन क्रांति का नाम दिया था। कुली बेगार और कुली उतार जैसी अमानवीय प्रथा को खत्म करने में उत्तरायणी मेले की अहम भूमिका रही।

बागेश्वर में लगने वाले उत्तरायणी मेले का धार्मिक के साथ ही ऐतिहासिक महत्व भी है। उस दौर में राष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बडे़ आंदोलन की तैयारी चल रही थी। तब पर्वतीय क्षेत्र में आवागमन के साधन नहीं होने के कारण ब्रिटिश सरकार कुली उतार और कुली बेगार जैसी अमानवीय व्यवस्था का सहारा ले रही थी।

1921 को उत्तरायणी पर्व के अवसर पर कुली बेगार आंदोलन की शुरुआत हुई। विभिन्न गांवों से आए लोगों की भीड़ काफी जोश में थी और देखते ही देखते यहां प्रदर्शन शुरू हो गया। सरयू और गोमती के संगम (बगड़) के मैदान से इस आंदोलन का उद्घोष हुआ। आंदोलन के शुरू होने से पहले ही तत्कालीन डीएम ने पंडित हरगोविंद पंत, लाला चिरंजीलाल और बद्री दत्त पांडे को नोटिस पकड़ाए लेकिन उन पर इसका कोई असर नहीं हुआ।

हजारों लोगों का जुलूस सरयू बगड़ की ओर चल पड़ा। जुलूस में सबसे आगे एक व्यक्ति झंडा लेकर चल रहा था, जिसमें लिखा था कुली बेगार बंद करो। इस दौरान तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर डायबल भीड़ में मौजूद था। उसने भीड़ पर गोली चलानी चाही लेकिन पुलिस बल कम होने के कारण वह सफल नहीं रहा। कुली बेगार नाटक का मंचन बागेश्वर में कुली प्रथा के रजिस्टर बहाए जाने की घटना स्वतंत्रता आंदोलन के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।

उसी की याद में स्वतंत्रता संग्राम उत्तराधिकारी संगठन ने नुमाईशखेत में कुली बेगार का मंचन किया। संगठन से जुड़े लोग शनिवार की देर शाम चामी गांव में पहुंचे। यहां से रविवार को सुबह बागेश्वर पहुंचे। यहां सांस्कृतिक झांकी में शामिल हुए। यहां से झांकी नुमाईशखेत पहुंची। जहां नाटक का मंचन हुआ।

ये है कुली बेगार प्रथा
कुली बेगार आंदोलन 1921 में उत्तराखंड के बागेश्वर नगर में आम जनता द्वारा अहिंसक आंदोलन था। आम आदमी से कुली का काम बिना पारिश्रमिक दिए कराने को कुली बेगार कहा जाता था। विभिन्न गांव के प्रधानों का यह दायित्व होता था, कि वह एक निश्चित अवधि के लिए, निश्चित संख्या में कुली वर्ग को उपलब्ध कराएगा।

इस काम के लिए प्रधान के पास बाकायदा एक रजिस्टर भी होता था, जिसमें सभी गांववासियों के नाम लिखे होते थे और सभी को बारी-बारी यह काम करने के लिये बाध्य किया जाता था। इस आंदोलन का नेतृत्व बद्री दत्त पांडे ने किया था।

बेगार प्रथा से संबंधित रजिस्टर नदी में बहाए
4 जनवरी 1921 को कुली बेगार प्रथा से पीड़ित लोगों ने सरयू नदी तट पर पहुंचकर बेगार प्रथा से संबंधित रजिस्टरों को फाड़कर नदी में प्रवाहित कर इस प्रथा का हमेशा के लिए अंत कर दिया था। गांवों के प्रधान अपने साथ कुली रजिस्टर लेकर पहुंचे थे। शंख ध्वनि और भारत माता की जयकारों के साथ इन कुली रजिस्टरों को फाड़कर संगम में प्रवाहित कर दिया।

आंदोलन के बाद पांडे को मिली कुमाऊं केसरी की उपाधि
आंदोलन सफल होने के बाद जनता ने बद्री दत्त पांडे को कुमाऊं केसरी की उपाधि दी। इस प्रथा के विरोध में लोगों का प्रदर्शन जारी रहा। सरकार ने सदन में एक विधेयक लाकर इस प्रथा को समाप्त कर दिया। इस आंदोलन से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी बहुत प्रभावित हुए। वह स्वयं बागेश्वर आए और चनौदा में गांधी आश्रम की स्थापना की।

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