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दशहरा, दीपावली एवं होली पर्वों को एक साथ मनाने का पर्व है ‘लोसर’ पर्व - डुंडा, हर्षिल, बगोरी में लोग रंगे लोसर पर्व की खुशियां में

भागीरथी के तट पर स्थित जाड भोटिया समुदाय की मौजूदगी एक विशिष्ट संस्कृति का एहसास कराती है। खासतौर पर समुदाय के पारंपरिक लोसर पर्व पर उमंग और उल्लास का माहौल चरम पर रहता है। संस्कृति और परंपराओं के प्रतीक इस लोक पर्व पर होली व दीपावली,दशहरा एक साथ मनाते हुये बौद्ध पचांग के अनुसार नव वर्ष का स्वागत किया जाता है। ऋतुराज बंसत के दौरान डुंडा हर्षिल व बगोरी, जादुंग में मनाये जाने वाला लोसर पर्व हिन्दु पंचाग के अनुसार फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की मध्य रात्री से प्रारंभ होता है। इस लोक  पर्व पर जाड भोटिया समुदाय बौद्ध व स्थानीय परंपरा का अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है।

लगातार तीन दिनों तक आयोजित होने वाले उत्सव के लिये लोग अपने घरो को खास तौर सजाते हैं, तथा लोग गीत एवं पारंपरिक परिधानो के साथा समुदाय के ग्रामीण पहले दिन अपने ईष्ट देव के मंदिर प्रागंण में एकत्रित होते हैं। इस दिन को दीपावली के तौर पर मनाया जाता है। दुख रोग एवं अशांति को नष्ट करने के लिये एक जगह पर एकत्रित होकर छिलके जलाये जाते हैं, ग्रामीण इन छिलकों को मशाल को नदी में विसर्जित कर संपंन्नता के रूप में नदी स पत्थर घर ले जाते है। अगले दूसरे दिन दशहरा के तौर पर मनाया जाता है। इसमें गंगाजल से आटा गूंथकर गणेश की प्रतिमा बनाई जाती है। मूर्ति को छंग, चावल व आटे का भोग लगाया जाता है। त्यौहार के अंतिम दिन आटे की होली खेली जाती है और इसके लिये धान्य की कामना की जाती है। इस दिन लोग धार्मिक आस्था के प्रतीक पुराने झंडो को जमीन में गाडकर नये  झंडे फहराते हैं और लम्बी उम्र और समृद्धि की कामना करते हैं। इस मेले में क्षेत्र की आराध्य रिंगाली देवी के साथ ही मेहमानो व सगे संबंधियों की आवाभगत  की जाती है।  

 

डुंडा में लौसर पर्व छिलके जलाकर दीपावली मनाते समुदाय के लोग
डुंडा में धूमधाम मनाया गया लौसर का पहला दिन उत्तरकाशी। भागीरथी नदी के तट पर स्थित जाड भोटिया समुदाय की मौजूदगी एक विशिष्ट संस्कृति का एहसास कराती है। खासतौर पर समुदाय के पारंपरिक लौसर पर पर्व पर यहां उमंग और उल्लास का माहौल बना रहता है।  संस्कृति व परंपरओं के प्रतीक  इस लोक पर्व पर होली, दीपावली व दशहरा एक साथ मनाते हुए नूतन वर्ष का स्वागत किया जाता है। कुछ ऐसा ही पर्व  वीरपुर, बगोरी डुंडा में देखने को मिला। जहां पर सोमवार देर रात को जाड भोटिया समुदाय के लोगों ने लोसर पर्व का पहला दिन दीपावली के रूप में मानाया।  

बौद्ध पंचांग के अनुसार सभी ग्रामीण  अपने ईष्ट देव के मंदिर प्रांगण में एकत्रित हुए और अपने दुख रोग एवं अशांति को नष्ट करने के लिए प्रतीक के तौर पर  लकड़ी के छिलके जलाए और  मशाल के रूप में नदी मे विसर्जित कर दिया। वहीं मंगलवार को समुदाय के लोगों ने नए साल के रूप में मनाया गया। इस मौके पर समुदाय के सभी लोग एक दूसरे के घर पहुंचे और हरियाली वितरित कर नए वर्ष की बधाई देकर बुजुर्गो का आशीर्वाद लिया।  वीरपुर के ग्राम प्रधान राजेश नेगी, पूर्व प्रधान नारायण सिंह, राम सिंह, भोपाल सिंह सीता राम ने बताया कि कि लोसर को मनाने की यह पौराणिक परंपरा है, जो आज भी निरंतर जारी है। 
 

 

 

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  • Web Title:losar festival celebrated with gusto in different cities in uttarakashi district of uttarakhand