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उत्तराखंड की मशहूर लोक गायिका कबूतरी देवी ने दुनिया को कहा अलविदा-VIDEO

Folk Singer Kabutri Devi

शनिवार की सुबह उत्तराखंड की पहली लोकगायिका कबूतरी देवी का पिथौरागढ़ जिला अस्पताल में निधन हो गया। उनकी बिगड़ती हालत को देखकर डॉक्टरों ने हायर सेंटर रेफर किया था। लेकिन धारचूला से हवाई पट्टी पर हेलीकॉप्टर के न पहुंच पाने के कारण वह इलाज के लिए हायर सेंटर नहीं जा पाई। इस दौरान उनकी हालत बिगड़ गई और उन्हें वापस जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। जिसके बाद उनका निधन हो गया। 

आवाज को आकाशवाणी लखनऊ व नजीबाबाद तरसते थे 

बेगम अख्तर और आकाशवाणी लखनऊ पर !! “आज पाणि झौं-झौ, भोल पाणि झौं-झौं, पोरखिन त न्है जूंला” और “पहाड़ो ठण्डो पाणि, कि भलि मीठी बाणी” जैंसे गीतों को जब वो हाई पिच पर गाती थी,लोगों के मुह से यही शब्द निकलते थे। दुबली पतली काया, तराशे हुए नैन-नक्श, सुघड़ वेश-भूषा, मीठी सुसंस्कृत भाषा यही है कबूतरी देवी का परिचय। आप लोगों ने यदि 70-80 के दशक में नजीबाबाद और लखनऊ आकाशवाणी से प्रसारित कुमांऊनी गीतों के कार्यक्रम को सुना होगा, तो एक खनकती आवाज आपके जेहन में जरुर होगी। कबूतरी देवी की आवाज के लिए एक समय आकाशवाणी लखनऊ व नजीबाबाद तरसते थे।

जंगल में घास काटते समय साधे सुर

पिथौरागढ़ के क्वीतड़ गांव की कबूतरी देवी किसी स्कूल कालेज में नहीं पढ़ी, न ही किसी संगीत घराने से ही उसका ताल्लुक रहा बल्कि उसने पहाड़ी गांव के कठोर जीवन के बीच कला को देखा ,अपनाया, उसे अपनी खनकती आवाज से आगे बढ़ाया। जब टीवी या टेप तब नहीं था तब रेडियो में जो गीत प्रसारित होते थे कबूतरी उन्हें सुनकर याद करती। सुना, आत्मसात किया, फिर जंगल में घास काटते समय उसे सुर में साधा। यही थी रिहर्सल।

ससुराल आकर मिला गायकी आजमाने का मौका

14 साल की उम्र में काली चंपावत जिले से सोर पिथौरागढ़ जिले ब्याह कर लाई गई कबूतरी के माता-पिता दोनों उस्ताद थे। ससुराल आकर कबूतरी देवी को अपनी गायकी आजमाने का मौका मिला। पति दीवानी राम उन्हें कई आकाशवाणी केन्द्रों में ले गए। संगीत की औपचारिक तालीम न लेने पर भी उनका अनुभव सुर व ताल को अपनी उंगली पर नचाना है वह गाने के साथ खुद हारमोनियम बजाती हैं तो साथी तबला वादक को सही निर्देश भी देती हैं। दरअसल कबूतरी देवी का संबंध पहाड़ की उस परंपरागत गायकी से रहा है जिसे यहां की मूल कला भी कहा जा सकता है। आज शायद संगीत प्रेमी उनको भूल गए हो लेकिन बीच-बीच में कला का सम्मान करने वाले कुछ लोग उन तक पहुंचते रहे हैं यही उनके जीवन का सबसे बड़ा संतोष है। कबूतरी देवी का जीवन संघर्ष यह समझने में मदद कर सकता है कि वास्तविक कला क्या होती है, वह कहां से उपजती है तथा उसका विज्ञान क्या है।

'भात पकायो बासमती को भूख लागी खै कबूतरी देवी की कही इन पंक्तियों से हम उनके व्यक्तित्व का अंदाज लगा सकते हैं कि बिना किसी से कोई उम्मीद व अपेक्षा किए कैसे उन्होंने अपना जीवन सादे तरीके से जिया। इस महान लोक गायिका को यंग उत्तराखंड उनके उत्तराखंड के लोक गीत एवं संगीत में इस अमूल्य योगदान को सलाम करता है और वर्ष 2011 का महान लोकगायिका के सम्मान से सम्मानित करती है।

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