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Hindi News उत्तराखंडदेवताओं में आस्था के आगे जंगल की आग भी बेअसर, मंदिर में भगवान के सामने गुहार

देवताओं में आस्था के आगे जंगल की आग भी बेअसर, मंदिर में भगवान के सामने गुहार

जिला मुख्यालय में ढूंगा, धारापानी रतवाली, मुनस्यारी के हरकोट, मल्ला घोरपट्टा वन पंचायत, गंगोलीहाट में हाट, जजुट उपराड़ा, मड़कनाली, रावलगांव आदि करीब 20 से अधिक जंगल देवी मां को समर्पित हैं।

देवताओं में आस्था के आगे जंगल की आग भी बेअसर, मंदिर में भगवान के सामने गुहार
Himanshu Kumar Lallपिथौरागढ़। हिन्दुस्तानTue, 07 May 2024 03:22 PM
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प्रदेश भर में जहां एक और जंगलों में आग लगने से हजारों हेक्टेयर वन संपदा जलकर राख हो गई है। वहीं, सीमांत के कई जंगल ऐसे भी हैं जहां आग की एक चिंगारी भी वन संपदा को छू नहीं सकी है। सीमांत में जंगलों को संरक्षण के लिए देवी मां को चढ़ाने की अनूठी परंपरा है। ग्रामीणों ने कई जंगलों को देवी मां को समर्पित किए हैं।

जनपद में वनों के घटते दायरों को बढ़ाने के लिए ग्रामीण जंगलों को एक निश्चित समयावधि पांच से लेकर दस साल के लिए माता भगवती, चंडिका, कोटगाड़ी को समर्पित करते हैं। मान्यता है कि इसके बाद देवी के स्वामित्व में जंगल रहता है और तय अवधि में कोई जंगल से पेड़ काटता है या किसी तरह का नुकसान पहुंचाता है तो उसको देवी मां स्वत: दंड देती हैं।

जिला मुख्यालय में ढूंगा, धारापानी रतवाली, मुनस्यारी के हरकोट, मल्ला घोरपट्टा वन पंचायत, गंगोलीहाट में हाट, जजुट उपराड़ा, मड़कनाली, रावलगांव आदि करीब 20 से अधिक जंगल देवी मां को समर्पित हैं। इन जंगलों में बीते पांच से दस साल के बीच आग की एक भी घटना नहीं घटी है।

जंगल बचाने के लिए करते हैं बारी-बारी गश्त
बागेश्वर। जिले के अधिकतर जंगलों में जहां आग लगी हुई है। वहीं कांडा कमस्यार का औलानी का जंगल पूरी तरह हरभरा है। दस साल से यहां किसी ने आग की घटना नहीं देखी है। जंगल को गांव के लोगों ने अपनी ईष्टदेवी चंडिका माता को समर्पित किया है।

फायर सीजन में ग्रामीण खुद भी जंगल को बचाने के लिए बारी-बारी पहरा करते हैं। इन दिनों ग्रामीण  बारीबारी से जंगल की गश्त कर रहे हैं ताकि कहीं आग की चिंगाी दिखे तो उसे नियंत्रित किया जा सके। 15 फरवरी से 15 जून का समय फायर सीजन होता है। इस दौरान कांडा कमस्यार के लोग अपने जंगलों को लेकर ज्यादा सतर्क हो जाते हैं। पिछले दस सालों से ग्रामीणों ने एक बार भी जंगल तक आग नहीं पहुंचने दी।

चंडिका माता को समर्पित करने के बाद से हर साल ग्रामीण जंगल में विशेष पूजा अर्चना करते हैं। जंगल से ग्रामीण चारा पत्ती व लकड़ी आदि भी नहीं काटते हैं केवल गिरी हुई और सड़ी हुई लकड़ी यहां से उठाने का प्रवाधान है। इस कारण जंगल हरा-भरा बना हुआ है।

ठांगा की ग्राम प्रधान गीता साहनी ने बताया कि गांव में 20 परिवार रहते हैं। सभी लोग जंगल को बचाने के लिए सजग रहते हैं। माता को समर्पित करने के बाद जंगल में एक मंदिर भी बनाया गया है। औलानी के ही नरेंद्र भौर्याल ने बताया कि चंडिका मंदिर के कारण अराजक तत्व भी जंगल में आग लगाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।

ढूंगा के जंगल को देवी मां को समर्पित किए हुए दस साल से अधिक समय हो गया है। इस दौरान जंगल में आग की घटना नहीं के बराबर हुई हैं। जबकि जंगल में पिरुल ही पिरुल मौजूद है।
सूरज बिष्ट, ढूंगा

मल्ला घोरपट्टा, हरकोट का जंगल कोटगाड़ी माता को समर्पित किए दस साल हो गया है। इस दौरान जंगल में आग नहीं लगी। लोग भय के कारण जंगल से चारा-लकड़ी तक नहीं लाते। 
खुशाल हरकोटिया, सरपंच वन पंचायत हरकोट।