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हलाला पर 3 साल की जेल, तलाक का एक नियम हिंदुओं पर भी डालेगा असर

उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य बनने जा रहा है जहां जहां आजादी के बाद पहली बार समान नागिरक संहिता लागू किया जाएगा। बिल में प्रावधान किया गया है कि हलाला जैसी प्रथा पर पूरी तरह से बैन रहेगा।

हलाला पर 3 साल की जेल, तलाक का एक नियम हिंदुओं पर भी डालेगा असर
Sudhir Jhaलाइव हिन्दुस्तान,देहरादूनTue, 06 Feb 2024 06:29 PM
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उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य बनने जा रहा है जहां जहां आजादी के बाद पहली बार समान नागिरक संहिता लागू किया जाएगा। इसका मतलब है कि शादी, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामलों में सभी धर्मों के लोगों के लिए एक जैसे नियम-कानून होंगे। उत्तराखंड सरकार का कहना है कि इससे धार्मिक और लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही कुछ कुप्रथाओं को भी खत्म किया जा सकेगा।

हलाला पर लगेगा बैन
समान नागरिक संहिता लागू हो जाने के बाद उत्तराखंड में हलाला प्रथा पर पूरी तरह प्रतिबंध लग जाएगा। इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक एक बार यदि शौहर अपनी बीवी को तलाक दे देता है तो उसे दोबारा अपनाने से पहले महिला को हलाला कराना होता है। पति से दोबारा मिलन से पहले उसे किसी गैर मर्द के साथ निकाह करके संबंध बनाना होता है और फिर उसे तलाक देकर वह दोबारा पुराने पति के साथ रह सकती है। यूसीसी के बिल में कहा गया है,' विवाह-विच्छेदित पति या पत्नी का एक दूसरे से पुनर्विवाह बिना किसी शर्त, जैसे कि पुनर्विवाह से पहले किसी तीसरे व्यक्ति से विवाह करना अनुमन्य (प्रतिबंधित) होगा।' 

तीन साल की जेल और एक लाख जुर्माना
हलाला कराने वाले लोगों के खिलाफ सख्त सजा का प्रावधान यूसीसी में किया गया है। बिल में हलाला शब्द का प्रयोग किए बिना कहा गया है कि इसके लिए विवश, दुष्प्रेरित या अभिप्रेरित करने वाले को तीन वर्ष की अवधि के कारावास और एक लाख रुपए तक जुर्माना और जुर्माना ना देने पर छह महीने के अतिरिक्त कारावास का दंड दिया जाएगा।

एक साल से पहले तलाक नहीं
समान नागिरक संहिता में तीन तलाक जैसी प्रथा पर रोक लगाने की दृष्टि से साफ किया गया है कि संबंध विच्छेद न्यायपालिका के जरिए ही हो सकता है। बिल में तलाक और इसकी प्रक्रिया को विस्तृत रूप से परिभाषित किया गया है। एक अहम प्रावधान यह भी है कि विशेष परिस्थित को छोड़कर तलाक की अर्जी शादी के एक साल के भीतर दायर नहीं की जा सकती है। 

बिल में कहा गया है विवाह-विच्छेत की कोई भी याचिका न्यायालय में तब तक प्रस्तुत नहीं की जाएगी जब तक कि याचिका प्रस्तुत करने की तिथि पर विवाह हुए एक वर्ष की अवधि व्यतीत न हुई हो। हालांकि, एक वर्ष से पूर्व याचिका प्रस्तुत करने की अनुमति कोर्ट तब दे सकता है जब कि मामला याचिकाकर्ता के लिए असाधारण कष्ट या असाधारण दुराचारता का है।

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