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हैप्रेक और हिमालया वेलनेस बेंगलुरु के बीच एमओयू साइन

हैप्रेक और हिमालया वेलनेस बेंगलुरु के बीच एमओयू साइन

संक्षेप: हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विवि और हिमालया वेलनेस कंपनी के बीच औषधीय पौधों की व्यावसायिक खेती के लिए एमओयू साइन हुआ है। यह समझौता पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय समुदायों की आजीविका, और छात्रों के लिए औद्योगिक प्रशिक्षण के अवसर प्रदान करेगा। इससे पहाड़ी किसानों को आर्थिक लाभ और वैज्ञानिक खेती की तकनीकों का लाभ मिलेगा।

Tue, 11 Nov 2025 03:45 PMNewswrap हिन्दुस्तान, श्रीनगर
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हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विवि के उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध केंद्र (हैप्रेक) और हिमालया वेलनेस कंपनी बेंगलुरु के बीच औषधीय एवं सुगंधित पौधों की व्यावसायिक खेती और अनुसंधान सहयोग को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से एमओयू साइन हुआ है। हस्ताक्षर हुए समझौते के अंतर्गत हैप्रेक अपनी नर्सरी में दारूहल्दी की औषधीय पौधों को विकसित करने का कार्य करेगा। हैप्रेक संस्थान के निदेशक डॉ. विजयकांत पुरोहित ने बताया कि यह समझौता न केवल पर्यावरण संरक्षण और औषधीय वनस्पतियों के संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि यह स्थानीय समुदायों के आजीविका सृजन में भी अहम भूमिका निभाएगा। बताया कि औषधीय पौधों की संगठित खेती से जंगली प्रजातियों पर दबाव कम होगा और पहाड़ी किसानों को आर्थिक लाभ मिलेगा तथा उन्हें वैज्ञानिक खेती की आधुनिक तकनीकों से जोड़ने का अवसर प्राप्त होगा।

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डॉ. पुरोहित ने बताया कि यह साझेदारी हैप्रेक संस्थान से स्नातकोत्तर के छात्र-छात्राओं के लिए भी नई संभावनाएँ लेकर आई है। इस एमओयू के अंतर्गत हिमालया कंपनी छात्रों को औद्योगिक प्रशिक्षण, इंटर्नशिप और शोध परियोजनाओं के अवसर उपलब्ध कराएगी, जिससे उन्हें व्यावहारिक अनुभव और कौशल विकास का लाभ मिलेगा। हैप्रेक के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुदीप सेमवाल ने बताया कि यह समझौता हिमालया जैसे अग्रणी ओद्योगिक कंपनी के साथ मिलकर पहाड़ी क्षेत्रों में औषधीय पौधों के संरक्षण, अनुसंधान और व्यावसायिक उपयोग को नई दिशा देगा। बताया कि हिमालया वेलनेस कंपनी के हेड-बॉटेनिकल एक्सट्रैक्शन यूनिट डॉ. अतुल एन. जाधव ने इस पहल को एक विन-विन मॉडल बताते हुए कहा कि इससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के साथ-साथ युवाओं में हरित उद्यमिता को भी बढ़ावा मिलेगा। कहा कि यह तीन-वर्षीय परियोजना उत्तराखंड राज्य में पर्यावरणीय स्थिरता, जैव विविधता संरक्षण और हरित अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में एक मील का पत्थर सिद्ध होगी।