बेटी की जान बचाना मां का पहला धर्म; फर्जीवाड़े में फंसी महिला सिपाही को कोर्ट से बड़ी राहत

Feb 17, 2026 08:00 am ISTGaurav Kala देहरादून
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महिला सिपाही से जुड़े फ्रॉड मामले में कोर्ट ने कहा कि किसी भी मां-बाप के लिए पहला धर्म बेटी की जान बचाना है। समय पर बिल न देना महज एक विभागीय अनियमितता हो सकती है, अपराध नहीं।

बेटी की जान बचाना मां का पहला धर्म; फर्जीवाड़े में फंसी महिला सिपाही को कोर्ट से बड़ी राहत

बेटी के दिल के ऑपरेशन के लिए विभाग से ली गई एडवांस रकम को गबन बताने और फर्जी दस्तावेज को लेकर धोखाधड़ी के केस में अदालत ने महिला सिपाही को बड़ी राहत दी है। अदालत ने न सिर्फ महिला सिपाही को आरोपमुक्त किया, बल्कि टिप्पणी की कि किसी भी माता-पिता की प्राथमिकता अपनी संतान को बचाना है, न कि बिल बाउचर जुटाना।

प्रथम अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संजीव कुमार की अदालत ने सबूतों के अभाव और विवेचना में खामियों को देखते हुए महिला सिपाही सुनीता को बरी कर दिया है । अदालत ने अपने अहम फैसले में टिप्पणी भी की। अदालत ने कहा कि समय पर बिल न देना महज एक विभागीय अनियमितता हो सकती है, अपराध नहीं।

मामला क्या है

अभियोजन के मुताबिक, महिला कांस्टेबल सुनीता ने अपनी बेटी के दिल में छेद होने के कारण उसके इलाज के लिए पुलिस मुख्यालय से जीवन रक्षक निधि के तहत 6.15 लाख रुपये और मुख्यमंत्री कोष से 75 हजार रुपये की सहायता ली थी। आरोप था कि सिपाही ने दिल्ली के अस्पताल के डॉ. संजीव कुमार के नाम से फर्जी एस्टीमेट और लेटर हेड जमा किए। जांच में वहां ऐसा कोई डॉक्टर नहीं पाया गया। इसी आधार पर 2017 में कोतवाली में धोखाधड़ी और कूटरचना का मुकदमा दर्ज किया गया था।

सरकार को कोई आर्थिक नुकसान नहीं हुआ

बचाव पक्ष ने कोर्ट में तर्क दिया कि महिला सिपाही को मिली रकम कोई अनुदान नहीं, बल्कि एडवांस (ऋण) थी। जिसे पुलिस विभाग को वेतन से कटना था। सुनवाई में यह साबित हुआ कि विभाग ने सिपाही के वेतन और फंड से कटौती कर उस रकम की भरपाई कर ली थी। कोर्ट ने माना कि जब पैसा वेतन से वसूल लिया गया, तो सरकार को कोई आर्थिक नुकसान नहीं हुआ और न ही आरोपी को कोई गलत लाभ मिला।

छेड़छाड़ के केस में आरोपी को बरी किया

अदालत ने एक अन्य फैसले में प्रेम सिंह बिष्ट को छेड़छाड़ और जान से मारने की धमकी देने के आरोपों से बरी कर दिया है। महिला ने आरोप लगाया था कि 21 मार्च 2018 को प्रेम सिंह ने उनका रास्ता रोका और पुराना मुकदमा वापस न लेने पर जान से मारने की धमकी दी। बचाव पक्ष ने दलील दी कि दोनों पक्षों में मुकदमेबाजी चल रही है और रंजिश के कारण झूठा केस किया गया है। कोर्ट ने पाया कि घटनास्थल भीड़भाड़ वाला था, लेकिन पुलिस ने न तो सीसीटीवी फुटेज खंगाली और न ही कोई स्वतंत्र गवाह पेश किया। कोर्ट ने आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।

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