उत्तराखंड की स्थानीय भाषाओं को 8वीं अनुसूचि में शामिल करने का किया जाएगा प्रयास: कोश्यारी
तीन दिवसीय राष्ट्रीय कुमाऊंनी भाषा सम्मेलन जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान में शुक्रवार को आयोजित किया गया। मुख्य अतिथि पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश
रुद्रपुर, संवाददाता। जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) में शुक्रवार से तीन दिवसीय राष्ट्रीय कुमाउनी भाषा सम्मेलन का शुभारंभ हुआ। मुख्य अतिथि एवं पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने कार्यक्रम का उद्घाटन किया। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा सीखने और बोलने पर गर्व होना चाहिए। स्थानीय भाषाओं की पहचान किसी भी समाज की सांस्कृतिक जड़ें मजबूत करती है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि उत्तराखंड की कुमाउनी और गढ़वाली भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के प्रयास जारी रहेंगे। कोश्यारी ने कहा कि नई पीढ़ी को कुमाउनी भाषा सिखनी चाहिए। कार्यक्रम के पहले दिन दो सत्र आयोजित किए गए।

उद्घाटन सत्र में पूर्व राज्यपाल के साथ साहित्यकार कौस्तुभानंद चंदोला, प्रो. बहादुर सिंह बिष्ट, प्रो. वीरेन्द्र सिंह बिष्ट, डॉ. एल.एम. उप्रेती और दयानंद आर्य ने सहभागिता की। इस दौरान विज्डम पब्लिक स्कूल के छात्र-छात्राओं ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया। पहले सत्र में ‘कुमाउनी भाषा का इतिहास और साहित्यिक परंपरा’ विषय पर वक्ताओं ने विचार रखे। ‘पहरू’ पत्रिका के पूर्व संपादक और उत्तराखंड भाषा संस्थान के सदस्य डॉ. हयात सिंह रावत ने कहा कि 1728 ईस्वी में रामभद्र त्रिपाठी ने कुमाउनी में ‘चाणक्य नीति’ का अनुवाद किया था। 1810 ई. से लेकर आज तक कुमाउनी में निरंतर साहित्य सृजन हो रहा है। उन्होंने कहा कि कुमाउनी भाषा में आज लगभग सभी विधाओं में सशक्त लेखन हो रहा है। कुमाउनी लेखक ब्रिगेडियर धीरेश जोशी ने कुमाउनी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया। वक्ताओं ने कहा कि भाषा को जीवंत रखने के लिए इसे विद्यालयी पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना जरूरी है ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे। दूसरे सत्र में कुमाउनी भाषा, संस्कृति, कला, रंगमंच और फिल्म पर पैनल चर्चा हुई। इस दौरान विनोद जोशी, ब्रिगेडियर धीरेश जोशी और डॉ. मोहन चंद्र पंत की पुस्तकों का विमोचन किया गया। साथ ही मीरा जोशी को वैद्य कल्याण सिंह बिष्ट कुमाउनी संस्कृति सेवी सम्मान प्रदान किया गया, जबकि घनश्याम भट्ट, गोपाल चम्याल, ललित मोहन सिंह जीना, गिरीश चंद्र जोशी, कुबेर सिंह कड़ाकोटी आदि को कुमाउनी भाषा, संस्कृति और साहित्य में योगदान के लिए सम्मानित किया गया। यहां पूर्व कुलपति डॉ. बी.एस. बिष्ट, नीरज पंत, डॉ. अजंता बिष्ट, चारु तिवारी, रमेश सोनी, किशन मलड़ा, डॉ. दीपा कांडपाल, महेंद्र ठकुराठी, भास्कर नेगी, माया रावत, रमेश प्रकाश पर्वतीय और प्रवीण प्रकाश समेत अनेक साहित्यकार, शिक्षाविद और विद्यार्थी मौजूद रहे।

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