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धिनुवा थ्यूं, खूब खैछ दूध छांछ, बैलो भयुं अब मेरी तर्फ को चांछ

ज्ञान प्रकाश संस्कृत पुस्तकालय में बुधवार को मासिक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें लावारिस गोवंशियों के दर्द को कवियों ने कविता के माध्यम से व्यक्त किया। काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. पीतांबर अवस्थी ने की। उन्होंने कहा हिंदू धर्म में गाय को गोमाता कहा जाता है। लेकिन आज समाज में जिस प्रकार से दूध पीने के बाद गायों को छोड़ दिया जाता है वह मानवीय असंवेदना को प्रकट करती है। क्लीन एंड ग्रीन परिवार के नीरज भट्ट ने कहा कि एक ऑपरेशन के तहत अधिकाधिक संवेदनशील लोगों को जोड़कर समूह के माध्यम से गायों को दुर्दशा से बचाया जाएगा। आनंदी जोशी ने कहा-जी भर शोषण कर मानव ने अंत में नाता तोड़ दिया, जीवन के इस कठिन दौर में चौराहे पर छोड़ दिया। कूड़ा खाकर पापी पेट की आग बुझाती हूं, मैं सबकी मां कहलाती हूं ... लावारिस गायों के दर्द को व्यक्त करने की कोशिश की। आशा सौन ने गाय का दर्द यूं व्यक्त किया.. निरीह पशुओं की आंखें, कहो कौन बांचे, प्रीत के रिश्ते कहां सांचे, स्वार्थ से मानव हर रिश्ते बांधे, कहते हैं सब मैं धाय हूं, मारी मारी फिरूं सड़कों पर हां में गाय हूं। लक्ष्मी आर्या ने कहा-गोरक्षा के लिए धन था जो बोलो कहां गया, मेरे नाम पर पाखंड कर अधर्मी, उसे भी खा गया। हेम थलाल ने कहा- धिनुवा थ्यूं, खूब खैछ दूध छांछ, बैलो भयुं अब मेरी तर्फ को चांछ। इस दौरान मनीष जोशी, ललित शौर्य आदि मौजूद रहे।

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