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दिसंबर के बाद जनवरी में भी बारिश-बर्फबारी नहीं, कोरी ठंड से उत्तराखंड में सूखे जैसे हालात

दिसंबर के बाद जनवरी में भी बारिश-बर्फबारी नहीं, कोरी ठंड से उत्तराखंड में सूखे जैसे हालात

संक्षेप:

नवंबर में 98 फीसदी तो दिसंबर और जनवरी सूखे गुजर गए। इस बार कोई मजबूत पश्चिमी विक्षोभ नहीं आने की वजह से सूखे जैसे हालात बने हैं। 17 और 18 जनवरी को हल्की बारिश की संभावना बन रही है।

Jan 13, 2026 07:51 am ISTGaurav Kala देहरादून
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उत्तराखंड में बारिश और बर्फबारी नहीं होने से उत्तराखंड में सूखे जैसे हालात हो पैदा हो गए हैं। फल, सब्जी के साथ ही गेहूं, जौ, मटर, सरसों की फसलों को 25 फीसदी तक नुकसान हो चुका है। जल स्रोतों पर पानी का डिस्चार्ज 20 फीसदी तक घट गया है। सूखी ठंड के बीच अत्यधिक पाला पड़ने से ग्लेशियर फ्रीज होने लगे हैं, इससे बिजली उत्पादन 64 फीसदी तक कम हो रहा है। सबसे बड़ी चिंता जनवरी में ही जंगलों की आग के रूप में सामने आई है। नमी कम होने से वनाग्नि की घटनाएं अभी से लगातार बढ़ने लगी हैं।

मौसम विज्ञान केंद्र देहरादून के निदेशक सीएस तोमर का कहना है कि नवंबर में 98 फीसदी तो दिसंबर और जनवरी सूखे गुजर गए। इस बार कोई मजबूत पश्चिमी विक्षोभ नहीं आने की वजह से इस तरह के हालात बने हैं। 17 और 18 जनवरी को हल्की बारिश की संभावना बन रही है।

जल संकट की ओर जा रहा उत्तराखंड

उत्तराखंड में नवंबर से जनवरी तक बारिश और बर्फबारी न होने से जल स्रोतों का डिस्चार्ज तेजी से घट रहा है। रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़ और चंपावत जैसे जिलों में पेयजल योजनाओं में पानी 20 से 30 प्रतिशत तक कम हो गया है। चमोली जिले में बांज के मुकाबले चीड़ के जंगल वाले क्षेत्रों पेयजल स्रोत अधिक प्रभावित हुए हैं। नैनीताल समेत कई जिलों में पारंपरिक धारे अभी से सूखने लगे हैं। धुमाकोट के मन्यागैरी, काफलगौरी , लिस्टयाखेत रौला आदि स्रोतों में पानी का डिस्चार्ज काफी कम हो गया है। पौड़ी और टिहरी में स्थिति का सर्वे शुरू कर दिया गया है। सिंचाई और जल संस्थान विभाग ने जियो-टैगिंग और निगरानी तेज कर दी है।

खेती और बागवानी पर पड़ रहा बुरा असर

पिछले ढाई महीने से बारिश और अब बर्फबारी नहीं होने से कृषि-बागवानी बुरी तरह प्रभावित हुई है। खासतौर पर गेहूं, जौ, सरसों, मटर की फसलें खराब होने लगी हैं। मैदानी इलाकों के मुकाबले पर्वतीय क्षेत्रों में स्थिति ज्यादा खराब हुई है। यहां 80 फीसदी खेती असिंचित है, जो लगातार पाला गिरने से पीली पड़ने लगी है। पौड़ी, टिहरी समेत कई जिलों में असिंचित कृषि रकबे सूखने की कगार पर हैं। वहीं, बर्फबारी नहीं होने 1500 घंटे के चीलिंग ऑवर्स नहीं मिलने से उत्तरकाशी, पौड़ी, चमोली, बागेश्वर, नैनीताल और अल्मोड़ा के सेब उत्पादकों की चिंता बढ़ा दी है। वहीं, मैदानी इलाकों में फसलों पर सिंचाई की लागत लगातार बढ़ रही है। रानीचौरी वानिकी महाविद्यालय की वैज्ञानिक कीर्ति कुमारी के मुताबिक इस वक्त फसलों को बचाने के लिए नमी की बहुत जरूरत है। खेतों में नमी नहीं होने से पाले से फसलें ज्यादा खराब हो रही हैं।

सर्दियों में जल चुके 16 हेक्टेयर जंगल

उत्तराखंड में सर्दियों में ही 16 हेक्टेयर जंगल जल चुके हैं। फारेस्ट फायर की कुल 29 घटनाएं रिकॉर्ड की गई हैं। इसमें गढ़वाल क्षेत्र में 13, जबकि संरक्षित वन क्षेत्र में सबसे ज्यादा 16 वनाग्नि की घटनाएं हो चुकी हैं। हालांकि कुमाऊं से अभी वनाग्नि की कोई सूचना रिकॉर्ड नहीं हुई है। गढ़वाल में पौड़ी, चमोली और उत्तरकाशी जिले में वनाग्नि की सूचनाएं लगातार मिल रही हैं।

कृषि मंत्री गणेश जोशी का कहना है कि कृषि विभाग सूखे की स्थिति पर नजर रख रहा है। विभाग ने पूरे राज्य से प्राथमिक रिपोर्ट भी ले ली है। अभी तक पर्वतीय क्षेत्रों में 15 फीसदी कृषि फसलों को नुकसान की रिपोर्ट मिली है। इससे निपटने के लिए विभागीय अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं। आगे भी अगर बारिश नहीं होती है तो यह नुकसान और बढ़ सकता है।

सड़कों पर नमक-चूने का छिड़काव

इस बार उत्तराखंड में सूखी ठंड के बीच अत्याधिक पाला पड़ रहा है। उत्तरकाशी की हर्षिल घाटी के साथ ही चमोली, पिथौरागढ़ और बागेश्वर के ऊपरी इलाकों में नदी नाले जमने लगे हैं। सड़कों पर पाला जमने से का दुर्घटना का खतरा बढ़ गया है। श्रीनगर-पौड़ी-कोटद्वार हाईवे, चकराता-मसूरी और चकराता-त्यूणी मोटर मार्ग, मसूरी शहर के कई मार्गों के साथ ही पर्वतीय इलाकों में प्रमुख पालाग्रस्त सड़कों पर नमक और चूने का छिड़काव कर प्रभाव को कम करने का काम किया जा रहा है। देहरादून के चकराता-कालसी मोटर मार्ग पर कोरवा तक, चकराता मसूरी मोटर मार्ग पर चोरानी तक, चकराता त्यूणी मोटर मार्ग पर चकराता से कोटी कनासर के बीच अस्माड के पास भारी पाला पड़ रहा है। इससे वाहनों के फिसलने का खतरा बना हुआ है। पुलिस स्थानीय लोगों के साथ ही पर्यटकों को इन सड़कों पर रात से लेकर तड़के तक सफर न करने की अपील कर रही है।

प्रदेश में घट गया बिजली उत्पादन

बर्फ नहीं पड़ने से जनवरी मध्य में भी कई पहाड़ काले नजर आ रहे हैं। वहीं, उच्च हिमालयी क्षेत्र में अत्यधिक पाला पड़ने से ग्लेशियर पूरी तरह फ्रीज होने लगे हैं। अलकनंदा, नन्दाकिनी पिंडर नदियां सामान्य से 6 मीटर नीचे बह रही है। नदियों के जल स्तर में आई कमी का सीधा असर जल विद्युत परियोजनाओं पर पड़ रहा है। श्रीनगर में अलकनंदा नदी पर बनी जल विद्युत परियोजना के प्रबंधक संतोष रेड्डी ने बताया कि चार टरबाइन में से एक ही टरबाइन से सिर्फ सात से आठ घंटे बिजली उत्पादन हो पा रहा है। पौड़ी की नयार नदी पर बनी दुनाऊं जल विद्युत परियोजना के अवर सहायक अभियंता बृजेश चौहान ने बताया कि बिजली उत्पादन आधे से भी कम पर आ गया है। टौंस, यमुना पर बनी परियोजनाओं में भी बिजली उत्पादन 50 फीसदी तक घट गया है।

Gaurav Kala

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गौरव काला: वरिष्ठ पत्रकार और स्टेट टीम सदस्य

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