Hindi Newsउत्तराखंड न्यूज़New Threat in Himalaya Than Climate Change Scientists Warn of Another Disaster
जलवायु परिवर्तन से भी बड़ी वजह! वैज्ञानिकों को हिमालय में फिर ‘प्रलय’ का अंदेशा

जलवायु परिवर्तन से भी बड़ी वजह! वैज्ञानिकों को हिमालय में फिर ‘प्रलय’ का अंदेशा

संक्षेप:

रिसर्च में चेतावनी दी गई है कि छोटे ग्लेशियरों का पिघलना, अस्थिर ग्लेशियर झीलों की संख्या में वृद्धि और बारश के पैटर्न में बदलाव से हिमालय क्लाइमेट टिपिंग पॉइंट (सीटीपी) के करीब है।

Dec 14, 2025 08:29 am ISTGaurav Kala शैलेंद्र सेमवाल, देहरादून, हिन्दुस्तान
share Share
Follow Us on

उत्तराखंड के तीन प्रमुख भू-वैज्ञानिकों ने हिमालय क्षेत्र में आपदाओं को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया में प्रकाशित इन भू-वैज्ञानिकों के संयुक्त शोध के अनुसार, हिंदूकुश क्षेत्र में आपदाओं की जिम्मेदार केवल जलवायु परिवर्तन और मौसम का बदलता पैटर्न नहीं है। इसके लिए मानवीय हस्तक्षेप, जैसे अनियोजित निर्माण और बस्तियां प्रमुख वजह हैं।

प्यार से लेकर प्रमोशन तक 2026 का पूरा हाल जानें ✨अभी पढ़ें

भू-वैज्ञानिकों ने चेताया कि यदि उत्तराखंड में फ्लड प्लेन जोनिंग ऐक्ट सख्ती से लागू नहीं किया गया तो धराली और केदारनाथ की आपदाओं जैसी घटनाएं बढ़ेंगी। यह शोध दून विश्वविद्यालय के डॉ.नित्यानंद हिमालयन रिसर्च एंड स्टडी सेंटर के जियोलॉजी विभाग के डॉ. यशपाल सुंदरियाल, भरसार विश्वविद्यालय के डॉ. एसपी सती और भू-वैज्ञानिक डॉ. नवीन जुयाल ने किया है। शोध के अनुसार, बढ़ती आबादी के कारण लोग नदियों के किनारे या अस्थिर ढलानों पर बस रहे हैं। व्यावसायिक गतिविधियां और हाईवे निर्माण भी बाढ़ के मैदानों को प्रभावित कर रहे हैं।

ये भी पढ़ें:हिमालय में 800 साल पहले आया था भूकंप, 7 से ज्यादा तीव्रता ने मचाई थी भारी तबाही
ये भी पढ़ें:ट्रैवल टिप्स: प्रकृति से एडवेंचर तक, नेपाल ट्रिप क्यों है खास?

सख्त कानून की पैरवीं

राज्य का ‘फ्लड प्लेन जोनिंग ऐक्ट 2012’ नदी के बीच से 100 मीटर के अंदर किसी भी निर्माण को प्रतिबंधित करता है, लेकिन इस कानून का पालन नहीं हो रहा। वैज्ञानिकों ने आपदा को दावत देते कारकों की रोकथाम के लिए प्रभावी नीतियां और सख्त कानून लागू करने की पैरवी की है। प्रो. सुंदरियाल ने कहा, ‘हमारे पूर्वजों ने गांव बसाने के लिए सोच-समझकर जगहें चुनीं, जो आमतौर पर बीच की ढलान पर और नदी के बाढ़ वाले मैदानों से बहुत ऊपर होती थीं। जैसे भागीरथी घाटी में पुराना धराली गांव और पिंडर घाटी में तुनारी गांव (थराली) सुरक्षित जगह पर हैं।

2010 के बाद बढ़ी आपदाएं

हिंदूकुश क्षेत्र में आपदाएं बढ़ी हैं। इस साल मानसून में यह क्षेत्र खतरनाक बाढ़ में चपेट में रहा। नॉर्थ वेस्टर्न हिमालय में 2010 के बाद से आपदाएं बढ़ी हैं। गिलगिट बाल्टिस्तान, हुंजा घाटी, खैबर पख्तूनख्वा में खतरनाक बाढ़ आई, जबकि पश्चिमी, मध्य और पूर्वी हिमालय पर बाढ़ और भूस्खलन का असर पड़ा।

संकट के बेहद करीब

शोध में चेतावनी दी गई है कि छोटे ग्लेशियरों का पिघलना, अस्थिर ग्लेशियर झीलों की संख्या में वृद्धि और बारश के पैटर्न में बदलाव से हिमालय क्लाइमेट टिपिंग पॉइंट (सीटीपी) के करीब है। औद्योगिक क्रांति के बाद वैश्विक तापमान एक डिग्री बढ़ा है। विश्व मौसम संगठन के अनुसार, यदि तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियल 20 साल से अधिक समय तक बना रहे तो यह सीटीपी माना जाएगा।

हिमालय क्षेत्र में प्रमुख आपदाएं

2013 केदारनाथ आपदा, 2014 लद्दाख की जांस्कर घाटी में ग्या झील का फटना, 2021 चमोली में ऋषि गंगा में बाढ़, 2023 सिक्किम में दक्षिण ल्होनक झील का फटना, 2023 और 2025 हिमाचल में ब्यास नदी में बाढ़, 2025 धराली और थराली में मलबे के बहाव से आई बाढ़ और 2025 जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में बाढ़।

Gaurav Kala

लेखक के बारे में

Gaurav Kala
गौरव काला को नेशनल, राजनीति, अंतरराष्ट्रीय, क्राइम और वायरल समाचार लिखना पसंद हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया में 10 साल कार्य का अनुभव। लाइव हिन्दुस्तान से पहले अमर उजाला, दैनिक जागरण और ईटीवी भारत जैसे मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। इन्होंने हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई की है। और पढ़ें

लेटेस्ट   Hindi News ,    बॉलीवुड न्यूज,   बिजनेस न्यूज,   टेक ,   ऑटो,   करियर , और   राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।