
खटीमा में मगरमच्छों की संख्या 86% तक बढ़ी
खटीमा में मगरमच्छों की संख्या 86% तक बढ़ी हल्द्वानी। तराई पूर्वी वन प्रभाग
खटीमा में मगरमच्छों की संख्या 86% तक बढ़ी हल्द्वानी। तराई पूर्वी वन प्रभाग की ओर से कराई गई मगरमच्छों की ताजा गणना में खुशखबरी सामने आई है। नौ रेंज में की गई गणना में कुल 212 मगरमच्छ चिह्नित किए गए हैं। सबसे अधिक 138 मगरमच्छ अकेले सुरई रेंज (खटीमा शहर से लगा स्थान) में मिले हैं। वर्ष 2014 में केवल सुरई रेंज में गणना की गई थी तब यहां 74 मगरमच्छ थे। यानी पिछले 11 वर्षों में यहां मगरमच्छों की संख्या में लगभग 86.5 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वन विभाग की 35 सदस्यीय टीम ने बीते दो दिसंबर से गणना शुरू की थी।
यह गणना तराई क्षेत्र की नौ रेंजों में फैले शारदा सागर जलाशय, बेगुल, धोरा, नानकमत्ता डैम, काकड़ा कोडाइल ट्रेल और शारदा की विभिन्न नहरों और जल स्रोतों में की गई। विशेषज्ञों के अनुसार मगरमच्छों की बढ़ती संख्या वन्यजीव संरक्षण के लिए सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसके साथ ही सतर्कता और जागरूकता बढ़ाना भी जरूरी है। गणना कार्य पूरी तरह भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूडब्लूआई) के दिशा-निर्देशों और सुरक्षा मानकों के अनुसार किया गया। विभाग ने लोगों से अपील की है कि जल स्रोतों के किनारे सावधानी बरतें और आबादी में मगरमच्छ दिखने पर तुरंत वन विभाग को सूचित करें। जियो टैग किए गए हमले वाले स्थान गणना के दौरान मगरमच्छों की मौजूदगी वाले स्थानों के साथ-साथ पिछले कुछ वर्षों में मगरमच्छों द्वारा हमले की घटनाओं वाले स्थानों को जियो-टैग किया गया है। वन अधिकारियों ने कहा कि जियो-टैगिंग से मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में बड़ी मदद मिलेगी। इन आंकड़ों के आधार पर स्थानीय ग्रामवासियों, पंचायत प्रतिनिधियों और संबंधित विभागों के साथ मिलकर एक ठोस रणनीति तैयार की जाएगी, ताकि मगरमच्छों के साथ-साथ मानव जीवन की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सके। इन रेंज में मिले इतने मगरमच्छ सुरई में 138, गौला में 21, बाराकोली में 17, डौली में 17, किलपुरा में पांच, खटीमा में पांच, दक्षिणी जौलासाल में एक, रनसाली में दो और काशीपुर में सात मगरमच्छ मिले हैं। कोट:: वन विभाग की टीम ने मगरमच्छों की गणना की है। पहली बार दिन व रात दोनों समय गणना की गई जिसमें कुल 212 मगरमच्छ दिखे हैं। वह स्थान जहां पर मगरमच्छों ने इंसानों पर हमला किया और जहां मगरमच्छ मिले हैं उन्हें जियो टैग किया गया है ताकि मानव वन्यजीव संघर्ष पर अंकुश लगाया जा सके। - हिमांशु बागरी, डीएफओ, तराई पूर्वी वन प्रभाग

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