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साहित्य उत्सव में गूंजी पहाड़ों की संस्कृति और संवेदना

साहित्य उत्सव में गूंजी पहाड़ों की संस्कृति और संवेदना

संक्षेप: नैनीताल में एबॉट्सफोर्ड एस्टेट में हिमालयन इकोज उत्सव का आयोजन किया गया। पहले दिन संस्कृति, साहित्य, पर्यावरण और समुदाय से जुड़े विषयों पर चर्चा हुई। आयोजक जाह्नवी प्रसाद ने बताया कि यह पर्व पहाड़ों और नाजुक पारिस्थितिक तंत्रों का उत्सव है। कई प्रमुख हस्तियों ने अपने विचार साझा किए और स्थानीय शिल्प का बाजार भी सजाया गया।

Sat, 1 Nov 2025 06:57 PMNewswrap हिन्दुस्तान, नैनीताल
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नैनीताल, संवाददाता। एबॉट्सफोर्ड एस्टेट में शनिवार को शुरू हुए हिमालयन इकोज उत्सव के पहले दिन संस्कृति, साहित्य, पर्यावरण और समुदाय से जुड़े विषयों पर रोचक चर्चाएं हुईं। उत्सव के दसवें संस्करण का आगाज पारंपरिक शंखनाद और स्वागत भाषण से हुआ। उत्सव की आयोजक जाह्नवी प्रसाद ने कहा कि दस वर्ष पहले छह वक्ताओं और 50 श्रोताओं से शुरू हुआ यह आयोजन आज हिमालयी संस्कृति और रचनात्मकता का जीवंत मंच बन चुका है। उन्होंने कहा कि यह पर्व पहाड़ों, समुदायों और उन नाजुक पारिस्थितिक तंत्रों का उत्सव है जो हमें एक-दूसरे से जोड़ते हैं। मुख्य वक्ता प्रसिद्ध कला इतिहासकार डॉ. अल्का पांडे ने इतिहास, पौराणिक कथाओं और पर्यावरण के संबंधों पर चर्चा की।

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उन्होंने कहा कि आदिवासी ज्ञान प्रणालियां हमें सिखाती हैं कि आध्यात्मिकता और पर्यावरण एक ही सत्य के दो पहलू हैं। उन्होंने कवि कालिदास का उल्लेख करते हुए हिमालय को जीवंत आत्मा के रूप में देखने की प्रेरणा दी। पहले सत्र में भूटान की कलाकार लेकी त्शेवांग ने पारंपरिक वाद्य यंत्रों पर भूटानी, पहाड़ी और हिंदी गीत प्रस्तुत किए। दूसरे सत्र में लेखिका अनुराधा राय ने अपनी आगामी पुस्तक पर चर्चा की और बताया कि कैसे पहाड़ उनके लेखन और दृष्टिकोण को आकार देते हैं। तीसरे सत्र में संरक्षणवादी नेहा सिन्हा और पत्रकार गार्गी रावत ने भारत के वन्यजीवों और उनके संरक्षण पर विचार साझा किए। इसके बाद अरुंधति नाथ और निहारिका बिजली ने बंगाली भूत कहानियों की परंपरा पर चर्चा की, जबकि जाह्नवी प्रसाद की नई पुस्तक ‘नैनीताल : मेमोरीज, स्टोरीज एंड हिस्ट्री’ का विमोचन किया गया। इसके बाद सुजीव शाक्य ने अपनी पुस्तक ‘नेपाल 2043 : द रोड टू प्रॉस्पेरिटी’ पर चर्चा की। समापन सत्र में राहुल भूषण और शगुन सिंह ने पर्यावरण-अनुकूल वास्तुकला और टिकाऊ जीवनशैली पर अनुभव साझा किए। उत्सव स्थल पर सजा कुमाऊं बाजार स्थानीय शिल्प, वस्त्र और व्यंजनों का आकर्षण बना रहा। पियोली, पाला, म्यार और बैनी जैसे ब्रांडों के साथ पिकल सिकल और रस्टीक स्लाइस कैफे की पेशकशों ने लोगों को खूब लुभाया। शाम को आयोजित सत्र में भारतीय रसोई से भोजन का ज्ञान में पोषण विशेषज्ञ रुजुता दिवेकर ने कविता खोसा से संवाद किया। दिन का समापन रेहमत-ए-नुसरत की सूफी संगीत प्रस्तुति के साथ हुआ, जिसने माहौल को सुरम्य बना दिया।