हिमालय में गर्म रातों से हर साल पिघल रही 22 गीगाटन बर्फ; क्या होंगे बड़े खतरे
आईआईटी की रिसर्च के अनुसार, हिंदू कुश हिमालय में रातें गर्म हो रही हैं। इससे हर साल 22 गीगाटन ग्लेशियर पिघल रहे हैं। वैज्ञानिकों ने बताया कि इससे क्या बड़े खतरे होंगे।

यदि आपको लगता है कि गर्मी सिर्फ मैदानों में बढ़ रही है, तो यह रिपोर्ट चौंका देगी। हिमालय जिसे एशिया का ‘वाटर टावर’ कहा जाता है तेजी से गर्म हो रहा है। इससे भी चिंताजनक यह है कि रात का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। इससे ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ गई है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर के वैज्ञानिकों का अध्ययन बताता है कि पहले रात में तापमान गिरने से बर्फ दोबारा जमने का मौका मिल जाता था, पर अब ऐसा नहीं हो पा रहा। इस कारण हिंदू कुश हिमालय के 54000 ग्लेशियरों में हर साल 22 गीगाटन बर्फ पिघल जा रही है। आने वाले समय से में इससे जल संकट, बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाएं तेजी से बढ़ेंगी।
आईआईटी की रिसर्च
आईआईटी खड़गपुर के सेंटर फॉर ओशियन, रिवर, एटमॉस्फियर एंड लैंड साइंसेज के अध्ययन के मुताबिक हिमालय के ऊंचाई वाले क्षेत्रों का तापमान मैदानी क्षेत्रों की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। मानसून से पहले के महीनों में उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर समेत कई पहाड़ी इलाकों में रात के तापमान में हर दस साल में 0.6 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी दर्ज की है। विज्ञान की भाषा में इसे 'एलिवेशन डिपेंडेंट वार्मिंग' कहते हैं, यानी जितनी अधिक ऊंचाई, उतनी तेज गर्मी।
44 वर्षों के शोध
यह शोध 1980 से 2024 तक के 44 वर्षों के मौसम और वायुमंडलीय आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित है। इसके निष्कर्ष जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट में प्रकाशित हैं। शोधकर्ताओं ने चेताया, हिमालय एशिया का सबसे बड़ा जल स्रोत है। वैज्ञानिकों ने रात के बढ़ते तापमान के दो कारण बताए हैं। पहला, बर्फ पिघलने के बाद काली चट्टानें व मिट्टी सामने आ जाती हैं, जो सूर्य की गर्मी ज्यादा सोखती हैं। दूसरा, वातावरण में बढ़ती नमी रात में गर्मी को पहाड़ों में ही रोक लेती है, जिससे पारा पर्याप्त रूप से कम नहीं हो पाता।
क्या होंगे बड़े खतरे
● गर्मियों में पेयजल और सिंचाई के लिए जल संकट
● हिमालयी राज्यों में आपदा की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ना
● करोड़ों लोगों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ेगा
● पर्वतीय पर्यटन, वन पारिस्थितिकी और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर दबाव
● ग्लेशियरों के पीछे हटने से ग्लेशियल झीलों की संख्या और आकार बढ़ना
2031 तक क्या होगा
शोध के अनुसार, यदि वर्तमान गति से पारा बढ़ा तो अगले 5 वर्षों में अधिकांश हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार और तेज हो सकती है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फबारी कम व वर्षा अधिक होने की प्रवृत्ति बढ़ेगी। नई ग्लेशियल झीलों का विस्तार होगा और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड का खतरा बढ़ेगा। शुरुआती वर्षों में नदियों में पानी ज्यादा दिख सकता है, बाद में जल प्रवाह का मौसमी संतुलन बिगड़ने लगेगा।
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