
सूरज में हो रहे विशाल विस्फोटों से बदल रहा अंतरिक्ष का मौसम
सूर्य के विशाल विस्फोटों (सोलर फ्लेयर) से अंतरिक्ष का मौसम बदल रहा है। डॉ. हेमा खड़ायत के शोध के अनुसार, ये विस्फोट सेटेलाइट सिस्टम और तकनीकी ढांचे पर गंभीर प्रभाव डालते हैं। शोध अमेरिकन जर्नल 'द...
- सूर्य से विशालकाय फ्लेयर निकलने से सेटेलाइट सिस्टम और अंतरिक्ष पर पड़ रहा असर - सूर्य के अत्यधिक पराबैंगनी और एक्स-रे तरंगदैर्ध्य पर नासा के लिए गए चित्रों और स्पेक्ट्रम के अध्ययन से हुआ खुलासा - हल्द्वानी की वैज्ञानिक डॉ. हेमा खड़ायत का शोध अमेरिकन जर्नल ‘द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में हुआ प्रकाशित जहांगीर राजू हल्द्वानी। सूरज में हो रहे विशाल विस्फोटों (सोलर फ्लेयर) से अंतरिक्ष का मौसम बदल रहा है। सूर्य से निकलने वाले विशालकाय फ्लेयर से तापमान बढ़ने के कारण सेटेलाइट सिस्टम और स्पेस एक्टिविटिज पर भी असर पड़ रहा है। सूर्य के अत्यधिक पराबैंगनी और एक्स-रे तरंगदैर्ध्य पर नासा व यूरोपियन अंतरिक्ष एजेंसियों द्वारा लिए गए चित्रों और स्पेक्ट्रम के अध्ययन से यह खुलासा हुआ है।
हल्द्वानी की वैज्ञानिक डॉ. हेमा खड़ायत का यह शोध शनिवार को विश्व की श्रेष्ठ पत्रिका अमेरिकन जर्नल ‘द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में प्रकाशित हुआ है। डॉ. हेमा खड़ायत अपने शोध का हवाला देते हुए बताती हैं कि प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्र के विशालकाय बादलों के फटने से सौर तूफानों की उत्पत्ति होती है। सूर्य से निकलने वाली ऊर्जा और विकिरण पृथ्वी पर केवल जीवन के लिए ही नहीं, बल्कि हमारे संचार, बिजली और तकनीकी ढांचे पर भी गहरा असर डालते हैं। सूर्य की सतह पर अचानक ऊर्जा विस्फोट होने को सोलर फ्लेयर कहा जाता है। यह घटना कुछ ही मिनट में इतनी अधिक ऊर्जा उत्सर्जित करती है कि उसकी तुलना लाखों मेगाटन हाइड्रोजन बम के एक साथ फटने से की जा सकती है। सूर्य में हो रही इस तरह की घटनाओं का अंतरिक्ष के मौसम पर व्यापक प्रभाव पड़ रहा है। अंतरिक्ष और उपग्रहों पर बुरा प्रभाव डॉ. खड़ायत बताती हैं कि कभी-कभी सूर्य की बाहरी परत से भारी मात्रा में गैस व आवेशित कणों के विशाल बादल लगभग 2500 किलोमीटर प्रति सेकंड तक की गति से बाहर की ओर निकलते हैं। जिसे कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) कहा जाता है। सौर तूफानों से पैदा हुए यह उच्च ऊर्जा वाले कण और चुंबकीय बल रेखाएं जब पृथ्वी के पास पहुंचते हैं तो जीपीएस सिस्टम, रेडियो संचार और विद्युत लाइनों को क्षतिग्रस्त कर देते हैं। सूर्य पर होने वाले विस्फोट, अंतरिक्ष व उपग्रहों पर बहुत बुरा प्रभाव डालते हैं। ये सौर विस्फोट अंतरिक्ष यात्रियों के जीवन के लिए भी हानिकारक होते हैं। इसका असर उत्तरी ध्रुव के पास स्थित देशों में सबसे ज्यादा होता है। वहां के ट्रांसफार्मर खराब हो जाते हैं व गैस पाइप लाइनें फट जाती हैं। विस्फोट से निकलने वाले रेडिएशन से हवाई जहाज के नेवीगेशन सिस्टम भी प्रभावित होते हैं। वरिष्ठ वैज्ञानिकों की मदद से पूरा किया शोध डॉ. खड़ायत ने भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला के प्रोफेसर भुवन जोशी, कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल के प्रोफेसर रमेश चंद्रा और रॉयल ऑब्जर्वेटरी ऑफ बेल्जियम की डॉ. बिनल पटेल के सहयोग से यह शोध पूरा किया। इस कार्य में वैज्ञानिकों ने सूर्य की सबसे रहस्यमयी घटनाओं में से एक कोरोनल मास इजेक्शन को समझने की दिशा में अहम कदम बढ़ाया है। अध्ययन में पाया गया कि सूर्य पर उच्च तापीय फ्लक्स रस्सी और शक्तिशाली चुंबकीय बल रेखाएं उच्च दबाव के कारण धीरे-धीरे उठती हैं और अचानक तेज गति में बदलकर लगभग 400 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से फैलती हैं। इस प्रक्रिया में चुंबकीय पुनर्संयोजन अर्थात मैग्नेटिक रिकनेक्शन की क्रिया एक अहम भूमिका निभाती है। यह शोध सौर तूफानों की शुरुआती पहचान और भविष्य में अंतरिक्ष के मौसम की भविष्यवाणी व उपग्रह सुरक्षा के लिए अहम है। डॉ. खड़ायत को मिल चुकी हैं इसरो की फेलोशिप: डॉ. हेमा खड़ायत को भारतीय तारा भौतिकी संस्थान, बेंगलुरु और इसरो के भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला, अहमदाबाद में पोस्ट डॉक्टोरल फेलोशिप प्राप्त हो चुकी है। वर्तमान में डॉ. हेमा महारानी लाल कुंवरी स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बलरामपुर(यूपी) में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर हैं और लगातार शोध कार्यों में योगदान दे रही हैं। उनकी उपलब्धियों की श्रृंखला में पिछले वर्ष उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार के काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की एक बड़ी शोध परियोजना मिली थी। हाल ही में, डॉ. हेमा को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अधीन आने वाले अंतर-विश्वविद्यालय खगोल विज्ञान और खगोल भौतिकी केंद्र, पुणे द्वारा प्रतिष्ठित विजिटिंग एसोसिएट का सम्मान मिला है।

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