जमरानी: पुनर्वास के इंतजार में खत्म हो रही विस्थापितों की जमा पूंजी
देवेंद्र रौतेला हल्द्वानी। जमरानी बांध डूब क्षेत्र प्रभावित पुनर्वास की बाट जोह रहे हैं।
देवेंद्र रौतेला हल्द्वानी। जमरानी बांध डूब क्षेत्र प्रभावित पुनर्वास की बाट जोह रहे हैं। जून 2025 में निर्माण कार्य शुरू करने के लिए पनियाबोर ग्राम पंचायत के खलजला तोक से 21 परिवारों को गांव से हटा कर अमृतपुर के अस्थायी कैंप में शिफ्ट किया गया था। एक साल बाद भी स्थायी पुनर्वास न होने से इनकी जमा पूंजी खत्म होने के कगार पर है।
जमरानी बांध का निर्माण
गौला नदी के अपर स्ट्रीम में जमरानी बांध का निर्माण किया जा रहा है। नदी के नजदीक बसे खलजला को निर्माण कार्य के लिए मशीनों को लगाने के लिए खाली कराया गया है। यहां पीढ़ियों से रह रहे 21 परिवारों को गांव से बाहर कर 21 जून 2025 को रानीबाग के नजदीक अमृतपुर में सिंचाई विभाग के बने अस्थायी कैंप भेजा दिया गया। इस दौरान ग्रामीणों को आश्वासन दिया गया कि जल्द ही उन्हें पुनर्वास के लिए प्रस्तावित प्राग फार्म में बसा दिया जाएगा। वहीं एक साल बाद भी हालात जस के तस बने हुए हैं। कभी अपने खेत खलिहानों में घूमने वाले ग्रामीण अस्थायी कैंप के दो कमरों में कैद हो गए हैं। गांव से बाहर होते ही उनकी खेती और रोजगार दोनों छूट गए। ऐसे में बांध के लिए डूबने वाली जमीन के बदले मिले मुआवजे की रकम से घर का खर्च चला रहे हैं। जिससे उनकी जमा पूंजी लगातार खत्म हो रही है। इनके हालात देख कर डूब क्षेत्र से विस्थापित होने वाले अन्य परिवार पुनर्वास के लिए आशंकित बने हुए हैं।
आर्थिक परेशानियाँ
रकम नहीं होगी तो मकान के लिए लेना पडेगा कर्ज
बांध निर्माण से प्रभावित हो रहे परिवारों को प्राग फार्म में कृषि भूमि के साथ ही आवासीय भूखंड दिया जाना है। ग्रामीणों को यहां अपने खर्च पर ही मकान का निर्माण करना है। लगातार खत्म हो रही जमा पूंजी से उन्हें चिंता सता रही है कि नया घर कैसे बनेगा। आशंका बनी हुई है कि जल्द पुनर्वास नहीं होने पर कर्ज लेना मजबूरी हो जाएगा।
विस्थापन की संख्या
213 परिवारों को होना है पुनर्वास
जमरानी बांध के निर्माण के बाद नदी से लगे हुए छह गांव डूब जाएंगे। कृषि भूमि और मकान डूबने पर यहां से 213 परिवारों को पूरी तरह से विस्थापन होना है। किच्छा के नजदीक प्राग फार्म में पुनर्वास के लिए जरूरी सुविधाओं का विकास कर पुनर्वास किया जाना है.
पशुओं की दिक्कतें
पशुओं के लिए घास भी खरीदना बनी मजबूरी
ग्रामीणों के साथ ही उनके पशुओं को भी गांव छोड़ कर अस्थायी कैंप में रहना पड़ रहा है। इनके रहने के लिए विभाग ने टिन शेड बनाए हैं। खेत नहीं होने से ग्रामीणों को पशुओं को घास भी खरीद के देनी पड़ रही है।
ग्रामीणों की शिकायतें
बोले ग्रामीण ----
छह माह में हमें कृषि भूमि और मकान का भूखंड देने का आश्वासन दिया गया। एक साल बाद भी अस्थायी कैंप में रह रहे हैं। परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है।
प्रेम राम आर्या, प्रभावित ग्रामीण (फोटो)
हमारे खेत और मकान हम से धोखा कर छीन लिए गए हैं। जिससे खेती और रोजगार दोनों का संकट आ गया है। इसके लिए विभाग से लगातार मांग की जा रही है।
अनिल कुमार, प्रभावित ग्रामीण (फोटो)
बुजुर्गों को गांव से बाहर कर यहां कैद कर दिया है। मुआवजे में मिली धनराशि परिवार का खर्च चलाने में खर्च हो रही है। जल्द ही अब कर्ज लेने की नौबत आ जाएगी।
जसी राम, प्रभावित ग्रामीण (फोटो)
खेत नहीं होने से पशुओं के लिए चारे का संकट बना हुआ है। घास भी खरीद कर पशुओं को दे रहे हैं। पानी के अलावा परिवार के लिए सब खरीदना पड़ रहा है।
शांती देवी, प्रभावित ग्रामीण (फोटो)
बोले अधिकारी ----
प्राग फार्म में सड़क, सीवरेज सहित अन्य सुविधाओं का विकास किया जा रहा है। मानसून के बाद नवंबर तक सभी बांध प्रभावितों का पुनर्वास कर लिया जाएगा। - एमके खरे, महा प्रबंधक जमरानी परियोजना (फोटो)
सामान्य प्रश्न
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