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महावीर चक्र विजेता की पत्नी को चाहिए न्याय, व्यथा सुन आपका भी दिल भर आएगा

भारत-पाक युद्ध में 1971 में शहीद हुए चमोली नंदप्रयाग निवासी महावीर चक्र विजेता अनुसूया प्रसाद की पत्नी चित्रा देवी को न्याय चाहिए। उनकी पीड़ा है कि वह अपने पति की याद को चिरस्थाई नहीं रख पाई हैं। सरकार ने उन्हें भुला दिया है।

सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास बोर्ड से इतना भी नहीं हो पाया कि उनके पति की तस्वीर कहीं पर लगा पाते। यहां तक कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें व्यवस्थित करने के लिए जो आश्वासन दिए थे वह भी पूरे नहीं हो सके। चित्रा देवी ने शनिवार को एक बार फिर अपनी पीड़ा सीएम के सामने रखी।

1971 की लड़ाई में अनुसूया प्रसाद शहीद हो गए थे। वह सेना में अपनी ट्रेनिंग पूरी भी नहीं कर पाए थे कि युद्ध छिड़ गया। उनके कमांडर ने उनकी आयु व कम अनुभव को देखते हुए युद्ध में भेजने से मना कर दिया था। लेकिन वह फिर भी युद्ध में चले गए। उनकी शादी को सिर्फ दो माह ही हुए थे। युद्ध में अदम्य साहस का परिचय देते हुए वीरगति पाई थी। उस समय उनकी आयु 17 साल थी। वह देश में सबसे कम आयु में महावीर चक्र पाने वाले भी हैं। चित्रा की आयु उस समय सिर्फ 14 साल थी।

राष्ट्रपति भवन में महावीर चक्र लेते समय चित्रा के आंसू पोंछते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उस समय उनकी शादी उनके देवर शिवराम से तय कर दी थी। चित्रा के अनुसार इंदिरा उन्हें अपनी बेटी बनाकर अपने साथ रखना चाहती थीं। लेकिन उन्हें मैदान में नहीं रहना था, सो वापस आ गईं। इंदिरा गांधी ने उनके विवाह का प्रबंध किया और कहा कि जैसी सुविधाएं अनुसूया को मिलती थी, वैसी ही शिवराम को भी दी जाएंगी। अनुसूया के सम्मान पर कुछ खास करने का भी भरोसा दिया गया। इस घटना के 46 साल बाद भी चित्रा को इंदिरा गांधी के कहे हुए ये शब्द बार-बार कानों में गूंजते हैं। 

वह अब देहरादून के भाऊवाला में किराए के मकान में रहती हैं। उनको जो पेंशन मिलती है उससे वह अपने पति की याद में वॉलीबॉल प्रतियोगिता कराती हैं और बाकी समाज सेवा में खर्च करती हैं। कहती हैं इतने सालों में आंखों से आंसू खत्म हो चुके हैं।  से उनकी कोई संतान नहीं थी। शिवराम से उनकी तीन संतानें हैं। चित्रा कहती हैं कि सरकार से उन्हें कुछ नहीं चाहिए। सिर्फ पति के नाम को जीवित रखने के लिए किसी जगह स्मारक बनवा दें।

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