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संस्कृत के बिना भारत की पहचान अधूरी : अग्रवाल

संस्कृत भारती की ओर से आयोजित संस्कृत सम्मेलन में देववाणी संस्कृत भाषा के संरक्षण पर जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि संस्कृत के बिना भारत की कोई पहचान नहीं है। इसके संरक्षण के लिए सभी लोगों को आगे आने की जरूरत है। इस मौके पर नगर क्षेत्र में शोभायात्रा भी निकाली गई।

सरस्वती विद्या मंदिर धर्मपुर में चल रहे दो दिवसीय संस्कृत सम्मेलन के समापन पर विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल ने कहा कि संस्कृत भाषा भारत का प्राण है। इसीलिए हमने संस्कृत के उन्नति के लिए सुझाव देने के लिए एक समिति की रचना की है। विधानसभा में विधायकों और मंत्रियों के नाम पट्टिकाएं भी संस्कृत में लिखी गई है। महर्षि वेदव्यास ने यहीं से वेदों का और पुराणों का प्रचार किया था। यह संस्कृत की भूमि है। कृषि मंत्री सुबोध उनियाल कहा की संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने से संस्कृत की उन्नति नहीं होती। इसके लिए हमें जमीनी धरातल पर कुछ काम करना होगा। उन्होंने कहा संस्कृत वह भाषा है, जिसने हजारों लोगों के लिए स्वरोजगार प्रदान किया है।

राजपुर विधायक खजानदास ने भी देववाणी संस्कृत के संरक्षण पर जोर दिया। संस्कृत भारती के क्षेत्र प्रचार प्रमुख डॉ बुद्धदेव शर्मा ने कहा कि हमें सुंदर स्वास्थ्य संस्कार देश की एकता अखंडता और विश्व में भारत के गौरव को स्थापित करने के लिए संस्कृत का अध्ययन अवश्य करना चाहिए। इस मौके पर विशिष्ट अतिथि आशा आभा बर्थवाल, शिवनाथ संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य डॉक्टर सूर्य मोहन भट्ट, डॉ संतोष शर्मा, भानु प्रकाश गुप्त, डॉ मंजू बलोदी, दीपा सैनी, पूनम बडोनी, लक्ष्मी प्रसाद पाठक, राम भूषण बिजल्वाण, राम प्रसाद थपलियाल, सुनीता गुप्ता, शिव शंकर कपूर, प्रदीप सेमवाल, दीपक नवानी, बबीता बहुगुणा, देवीलाल प्रजापत, बलवीर सिंह, आसाराम मथानी आदि मौजूद रहे।

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  • Web Title:India's identity without Sanskrit