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इस आर्ट गैलरी में देखिए आपदा का दर्द और उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत...

देहरादून में देश की ऐसी आर्ट गैलरी खुली है, जिसमें आपदा दर्द को बेहतरीन कलाकृतियों के जरिये उकेरा गया है। इस गैलरी के माध्यम से लोग न केदारनाथ आपदा के बारे में जान सकेंगे। यही नहीं इस गैलरी में...

इस आर्ट गैलरी में देखिए आपदा का दर्द और उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत...
हिन्दुस्तान टीम,देहरादून Wed, 04 Oct 2017 06:30 PM
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देहरादून में देश की ऐसी आर्ट गैलरी खुली है, जिसमें आपदा दर्द को बेहतरीन कलाकृतियों के जरिये उकेरा गया है। इस गैलरी के माध्यम से लोग न केदारनाथ आपदा के बारे में जान सकेंगे। यही नहीं इस गैलरी में उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को भी बखूबी उकेरा गया है। देहरादून मसूरी विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) के सहयोग देहरादून में ऐसी आर्ट गैलरी का उद्घाटन बुधवार को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने किया। इस दौरान शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक भी मौजूद रहे।

इस आर्ट गैलरी में फोटो प्रदर्शनी, पेंटिंग और अन्य कलाकृतियों के माध्यम से 2013 की केदारनाथ आपदा के दंश को दिखाया जा रहा है। यही नहीं इसके जरिये उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को भी दुनिया से रूबरू कराया जा रहा है। घंटाघर काम्पलेक्स में खुली उतरा समकालीन कला संग्रहालय के जरिये नई पीढ़ी के कलाकारों को भी हुनर दिखाने का मौका मिलेगा। संग्रहालय की परिकल्पना करने वाले और उसे जमीनी हकीकत पर उतारने का श्रेय अनुभवी कलाकार सुरेन्द्र पाल जोशी को जाता है, जो गुनियाल गांव में रहते हैं। मूलरूप से अल्मोड़ा के और पांच बहनों के बीच अकेले भाई सुरेन्द्र जोशी कालेज ऑफ आर्ट्स जयपुर से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद अपनी माटी में लौट आए। उनका मकसद है कि कैनवास पेंटिंग से हटकर कुछ ऐसा करना, जिससे राज्य के युवा कलाकारों को भी नई राह मिल सके।

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उत्तराखंड की धरोहरों को कला के जरिए उकेर कर पर्यटकों को आर्कर्षित किया जाए। उन्हें एमडीडीए के सहयोग से अपने सपने को साकार करने का मौका मिला। इस आर्ट गैलरी में उत्तराखंड आपदा से लेकर तमाम ऐसी कलाकृतियां नजर आएंगी जो अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं। सुरेन्द्र का कहना है कि वह कला प्रदर्शनियों को लेकर कई देश घूम चुके हैं और देश में कला को लेकर उन्होंने पाया है कि समकालीन आर्ट श्रृंखला में हमारे कलाकार किसी से भी कम नहीं है। यही नयापन वह उत्तराखंड के कलाकारों में भी देखना चाहते हैं। उनका कहना है कि कला के जो कद्रदान दिल्ली-मुंबई में कलाकृतियां खरीदने जाते हैं उनके लिए उत्तराखंड में कला बाजार तैयार कना चाहते हैं।

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लेखक मंगलेश ने किया प्रेरित

सुरेन्द्र को कला की दिशा में जाने की प्रेरणा लेखक मंगलेश डबराल ने दी। गुनियाल गांव जूनियर हाईस्कूल से प्राथमिक शिक्षा के बाद वह ऋषिकेश के डिग्री कालेज से बीए किया और फाइन आर्ट्स के लिए लखनऊ चले गए। उनके कॅरियर के प्रति शंकित मां लज्जावती देवी ने पूछा कि क्या फाइन आर्ट्स का कोई स्कोप भी है। सुरेन्द्र ने मां का भरोसा नहीं टूटने दिया और वजीफे के दम पर बेचलर ऑफ फाइन आर्ट्स में दाखिला ले लिया। पढ़ाई के अलावा वह फिल्मों के पोस्टर बनाते। आनंद बाजार, अमृत प्रभात जैसी पत्रिकाओं के लिए इलेस्ट्रेशन का काम करते। इसके बाद ललिल कला अकादमी की स्कालरशिप के लिए उन्होंने राजस्थान को कर्मभूमि बनाया। यूनेस्को, ललित कला अकादमी, राजीव गांधी एक्सीलेंसी अवार्ड, ब्रिटिश काउंसिल में म्यूरल डिजाइन की फैलोशिप के अलावा उनके पास कई देशों में कला प्रदर्शनियों व यात्राओं का अनुभव है।

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सुरेन्द्र जिस साल उत्तराखंड लौटै उसी साल केदारनाथ आपदा आई थी। उनके मन में इसी थीम पर काम करने का विचार आया। इस थीम को वह पिछले तीन साल से मूर्त रूप दे रहे थे। साकार रूप में आने पर इसे संग्रहालय में जगह दी गई। सुरेन्द्र के अनुसार प्रीतम रोड में एमडीडीए ने लीक से हटकर उन्हें स्टुडियो बनाने में मदद दी। इसमें उन्होंने वुडन इंस्टोलेशन के जरिए आपदा के दर्द को दिखाया है।