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भारत का ये नागरिक कैसे बना ‘पाकिस्तानी’, बड़ी दिलचस्प है नंदकिशोर उर्फ हशमत अली की कहानी

भारत-पाकिस्तान के बंटवारे को 70 साल से ज्यादा हो चुके हैं। लेकिन कई लोग इस बंटवारे के दंश से अब तक जूझ रहे हैं। इन्हीं वक्त के मारों में उत्तराखंड के किच्छा (यूएसनगर) निवासी 85 वर्षीय नंदकिशोर उर्फ हशमत अली भी हैं। हशमत की एक ही आरजू है कि वो इस दुनिया को अलविदा कहें तो केवल और केवल हिन्दुस्तानी के रूप में। पर हालात ऐसे बने कि उनकी नागरिकता भारतीय से पाकिस्तानी और नाम भी हशमत अली हो चुका है। धर्म के कॉलम में हिंदू की जगह इस्लाम दर्ज है। 

मूलरूप से देवरिया के रहने वाले नंदकिशोर महज 12 साल की उम्र में कराची शहर जाकर जमींदार अबू अहमद के यहां नौकरी करने लगे थे। उस वक्त देश का बंटवारा नहीं हुआ था। वर्ष 1947 में देश का विभाजन हुआ तो वो कराची में ही फंस गए। कुछ साल बाद नंदकिशोर की देश लौटने की इच्छा को देखते हुए जमींदार अबू अहमद ने बीच का रास्ता निकाला और उन्हें हशमत अली नाम देते हुए, पाकिस्तानी पासपोर्ट पर 1965 में भारत भिजवा दिया।  भारत लौटे नंदकिशोर ने इस बीच शादी कर उत्तराखंड के किच्छा (नारायणपुर गांव) को अपना ठिकाना बना लिया।

भरापूरा परिवार 

नंद किशोर की याददाश्त बेहद कमजोर हो चुकी है। आठ साल पहले उनकी पत्नी का निधन हो गया। नंदकिशोर के चार पुत्र देव नारायण, रामनारायण, श्याम बहादुर और राजेश व तीन पुत्रियां हैं। रामनारायण बताते हैं कि बाबूजी अब चलफिर नहीं सकते, उन्हें फिर से भारतीय नागरिकता मिल जाती तो उनकी अंतिम इच्छा पूरी हो जाएगी। उनकी नागरिकता का आवेदन पहले लखनऊ और दून में गृह विभाग की धूल फांकता हुआ दिल्ली केंद्र सरकार तक पहुंच गया है, लेकिन इस पर अब तक फैसला नहीं हुआ है।

एनडी तिवारी के हस्तक्षेप से अटारी से हुई थी वापसी 

नंद किशोर लंबी अवधि के वीजा पर भारत में रहते आए हैं। लेकिन 1986 में एक वक्त ऐसा भी आया जब उन्हें स्थानीय पुलिस ने गिरफ्तार कर पाकिस्तान भेजने के लिए अटारी बार्डर तक भेज दिया था। संयोग की बात यह थी कि तब नारायण दत्त तिवारी विदेश मंत्री थे। संज्ञान में आने पर तिवारी ने मानवीय आधार पर हस्तक्षेप करते हुए उन्हें पाकिस्तान भेजने से रोका। 

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  • Web Title:How these Indian citizens became Pakistani interestingly story of Nand Kishore alias Hashmat Ali