पद्मश्री डॉ. प्रीतम भरतवाण के गीतों से गूंज उठी बैकुंठ चतुर्दशी मेले की पहली सांस्कृतिक संध्या
संक्षेप: श्रीनगर में बैकुंठ चतुर्दशी मेले की पहली सांस्कृतिक संध्या यादगार रही। प्रसिद्ध लोकगायक डॉ. प्रीतम भरतवाण ने देवी-देवताओं के जागर गीत गाए, जिससे पांडाल भक्तिरस में डूब गया। मुख्य अतिथि डॉ. आशुतोष सयाना ने इसे लोकसंस्कृति और एकता का प्रतीक बताया। मेयर आरती भंडारी ने मेले को शहर की सांझी विरासत कहा।
श्रीनगर। आस्था, लोकसंस्कृति और संगीत के संगम से सजे ऐतिहासिक बैकुंठ चतुर्दशी मेले की पहली सांस्कृतिक संध्या यादगार बन गयी। सुप्रसिद्ध लोकगायक पद्मश्री डॉ. प्रीतम भरतवाण ने अपनी मधुर आवाज़ में जब देवी-देवताओं का आह्वान करते हुए जागर गीतों की प्रस्तुति दी तो पांडाल में बैठे श्रोताओं पर देवता अवतरित हो गए। डॉ. भरतवाण ने शिवजी कैलाशु रैंदा, 'हे देवता म्यरु बगड़ बासु” गाया तो पूरा पंडाल भक्तिरस में डूब गया। इसके बाद उन्होंने गौरजा जागर, नंदा देवी का जागर, बांखली बग्वाल, लागी लागी बाण बर्फूली और छेली आ बिंदुली जैसे प्रसिद्ध लोकगीतों से ऐसा समां बांधा कि श्रोता देर रात तक तालियों से उनका उत्साहवर्धन करते रहे।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में मेडिकल कॉलेज श्रीनगर के प्राचार्य डॉ. आशुतोष सयाना और नगर निगम श्रीनगर की मेयर आरती भंडारी मौजूद रहीं। मुख्य अतिथि डॉ. आशुतोष सयाना ने कहा कि बैकुंठ चतुर्दशी मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति, कला और एकता का जीवंत प्रतीक है। ऐसे आयोजन हमारी परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और समाज में सांस्कृतिक चेतना जागृत करने का कार्य करते हैं। मेयर आरती भण्डारी ने कहा कि यह मेला शहर की सांझी विरासत है, जिसको सजोने एवं संवारने के लिए हम सभी को सामूहिक प्रयास करना चाहिए। उन्होंने अतिथियों व कलाकारों का आभार व्यक्त भी किया। मौके पर नगर आयुक्त नूपुर वर्मा, पार्षद आदि मौजूद रहे।

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