पश्चिमी विक्षोभ के बदले मिजाज से हिमालय पर भूस्खलन का खतरा, IIT रुड़की के शोध ने चिंता बढ़ाई

Feb 12, 2026 09:26 am ISTGaurav Kala रुड़की
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आईआईटी रुड़की की रिसर्च में बड़ी चिंता सामने आई है कि पश्चिमी विक्षोभ के बदले मिजाज से हिमालय में भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ा है। वैज्ञानिकों ने कुछ सुझाव भी दिए हैं।

पश्चिमी विक्षोभ के बदले मिजाज से हिमालय पर भूस्खलन का खतरा, IIT रुड़की के शोध ने चिंता बढ़ाई

आईआईटी रुड़की ने हिमालयी क्षेत्र की सुरक्षा और जल प्रबंधन को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। संस्थान के हालिया अध्ययन में संकेत दिया गया है कि बदलती जलवायु के कारण ‘पश्चिमी विक्षोभ’ के व्यवहार में संरचनात्मक बदलाव आ रहे हैं, जिससे हिमालयी क्षेत्रों में बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ सकती हैं।

यह अध्ययन प्रतिष्ठित इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लाइमेटोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। शोध के अनुसार, हिमालयी मौसम प्रणाली को नियंत्रित करने वाले पश्चिमी विक्षोभ अब पहले की तुलना में अधिक सक्रिय और प्रभावशाली हो रहे हैं। पारंपरिक रूप से ये विक्षोभ मुख्यतः सर्दियों में हिमपात के लिए जिम्मेदार माने जाते थे, लेकिन अब प्री-मानसून अवधि (मार्च से मई) में भी इनकी तीव्रता और आवृत्ति में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है।

तीव्र बारिश से भूस्खलन और फ्लैश फ्लड का खतरा

शोधकर्ताओं का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण ये पश्चिमी विक्षोभ लंबी दूरी तय कर रहे हैं और भारतीय उपमहाद्वीप तक पहुंचने से पहले वातावरण से अधिक नमी ग्रहण कर रहे हैं। परिणामस्वरूप, हिमालयी क्षेत्रों में बेमौसम और अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं। इस तरह की अचानक और तीव्र वर्षा पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन, फ्लैश फ्लड और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को बढ़ा सकती है।

हिमालय में भूस्खलन का खतरा

एक्सपर्ट्स को क्या चिंता

आईआईटी रुड़की के जल विज्ञान विभाग के प्रोफेसर अंकित अग्रवाल ने कहा कि मौसमी चक्र में हो रहे ये बदलाव केवल अल्पकालिक मौसमीय उतार-चढ़ाव नहीं हैं, बल्कि दीर्घकालिक जलवायु प्रवृत्तियों का संकेत देते हैं। उन्होंने बताया कि यदि यह रुझान जारी रहा तो इससे हिमालयी क्षेत्र में जल संसाधनों की उपलब्धता, कृषि पैटर्न और आपदा प्रबंधन रणनीतियों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

नीति निर्माता मजबूत करें जल प्रबंधन

अध्ययन में यह भी बताया गया है कि उत्तर भारत की जलवायु सहनशीलता (क्लाइमेट रेजिलिएंस) को मजबूत करने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि नीति-निर्माताओं को जल प्रबंधन, शहरी नियोजन और आपदा पूर्व चेतावनी तंत्र को नए मौसमीय पैटर्न के अनुरूप ढालना होगा।

आईआईटी रुड़की की यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब हिमालयी राज्यों में पिछले कुछ वर्षों में असामान्य वर्षा और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं। ऐसे में यह अध्ययन भविष्य की संभावित चुनौतियों के प्रति समय रहते सतर्क रहने का संकेत देता है।

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