रक्षाबंधन पर यहां अनोखे युद्ध की परंपरा, कभी दी जाती थी नरबलि; 28 अगस्त को फिर जुटेंगी सेनाएं

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रक्षाबंधन के दिन चंपावत के देवीधुरा में अनोखे युद्ध की परंपरा है। कभी यहां मां वाराह देवी के लिए नरबलि दी जाती थी। लेकिन अब युद्ध लड़ने का तरीका बदल गया है। 28 अगस्त को फिर सेनाएं जुटेंगी।

Bagwal War on Raksha Bandhan in champawat
रक्षाबंधन पर चंपावत के देवीधुरा में बग्वाल युद्ध की परंपरा है।

सतीश जोशी ‘सत्तू’/ नवनीत गहतोड़ी, चम्पावत

Bagwal War on Raksha Bandhan: रक्षाबंधन पर उत्तराखंड के चंपावत जिले में अनोखे युद्ध की परंपरा है। सदियों पुरानी इस धार्मिक परंपरा के लिए लोगों ने तैयारी तेज कर दी है। मां वाराही देवी को खुश करने के लिए वाराहीधाम देवीधुरा में बग्वाल युद्ध किया जाता है। पहले नरबलि की परंपरा थी, लेकिन बीते एक दशक से यहां बग्वाल के स्वरूप में थोड़ा बदलाव आया है। अब पत्थरों के स्थान पर फल और फूलों का प्रयोग किया जाने लगा है, लेकिन युद्ध की यह विशिष्ट परंपरा आज भी कायम है। 28 अगस्त को होने वाले ऐतिहासिक बग्वाल युद्ध के लिए चार खामों और सात थोकों की सेनाएं तैयार होने लगी हैं।

रविवार को बग्वाल मेले का भव्य शुभारंभ किया गया। कैबिनेट मंत्री राम सिंह कैड़ा और जिला पंचायत अध्यक्ष आनंद सिंह अधिकारी ने हनुमान मंदिर गेट के पास में फीता काट कर मेले का उद्घाटन किया। हनुमान मंदिर से लेकर मां वाराही मंदिर परिसर तक स्कूली बच्चों ने भव्य झांकी निकाली। इस वर्ष 13 दिवसीय बग्वाल मेला 23 अगस्त से शुरू होकर चार सितंबर को पुरस्कार वितरण के साथ संपन्न होगा। यहां का ऐतिहासिक खोलीखाड़ दुर्वाचौड़ मैदान एक बार फिर से प्रसिद्ध बग्वाल युद्ध के लिए सजने लगा है। इस मैदान में रक्षाबंधन के दिन बग्वाल युद्ध की अनूठी सांस्कृतिक परंपरा एक बार फिर से जीवंत रूप लेगी।

मां वाराही की तपस्या कर रोकी थी नर बलि प्रथा

मां वाराही के प्रति लोगों में अगाध आस्था है। मां वाराही मंदिर में रक्षा बंधन के दिन सदियों से बग्वाल हो रही है। एक व्यक्ति के बराबर रक्त निकलने के बाद बग्वाल थमती है। कहते हैं कि सदियों पहले एक वृद्धा ने तपस्या कर के मां वाराही को प्रसन्न किया था। जिसके बाद यहां नर बलि की प्रथा बंद हुई। इसके बाद बग्वाल की परंपरा की शुरुआत हुई। देवीधुरा में मां वाराही को प्रसन्न करने को रक्षाबंधन के दिन बग्वाल खेली जाती है।

पत्थरों की बौछार करके बहाया जाता था रक्त

श्रावण शुक्ल पूर्णिमा यानि रक्षा बंधन के दिन बग्वाल खेली जाती है। चम्याल, गहड़वाल, वालिक और लमगड़िया खाम के लोग आपस में बग्वाल खेलते हैं। वर्ष 2013 से पूर्व तक चारों खामों के लोग एक दूसरे पर पत्थरों की बौछार कर बग्वाल खेलते थे। एक व्यक्ति के बराबर रक्त निकलने का आभास होने पर मंदिर के पुजारी चंवर झुलाते हुए खोलीखाड़ दुर्वाचौड़ के मैदान में पहुंचते हैं। जिसके बाद बग्वाल रोक दी जाती है। इसके बाद सभी रणबांकुरे आपस सापस में एक-दूसरे के गले मिल कर कुशलक्षेम पूछते हैं। लेकिन वर्ष 2013 से अदालत के निर्देश के बाद फल और फूलों से बग्वाल खेली जाने लगी है। कई सदी पहले बग्वाल की शुरुआत से पूर्व नरबलि का चलन था। माना जाता है कि एक बार चम्याल खाम की वृद्धा के एकमात्र पौत्र की बलि के लिए बारी आई तो वंश नाश के डर से उसने मां वाराही की तपस्या की। तब माता ने प्रसन्न हो कर एक मानव बलि के बराबर रक्त बहने पर पूजा करने की बात स्वीकार की थी।

चार खामों के बीच खेली जाती है बग्वाल

पाटी। देवीधुरा में बग्वाल चार खामों के बीच होती है। पूर्वी छोर से चम्याल और गहड़वाल खाम बग्वाल खेलते हैं। जबकि पश्चिमी छोर से वालिक और लमगडिया खाम फरों की ढाल बना कर बग्वाल खेलते है। बग्वाल के दौरान चारों खाम के लोग अलग-अलग साफे पहन कर खोली खाड़ दुर्वाचौड़ के मैदान में पहुंचते हैं। गहड़वाल खाम केसरिया, चम्याल खाम गुलाबी, वालिक खाम सफेद और लमगड़िया खाम पीले साफे पहनकर बग्वाल खेलते हैं।

बग्वाल युद्ध अब सामाजिक सद्भाव का प्रतीक

गौरतलब है कि देवीधुरा की बग्वाल यहां के लोगों की धार्मिक मान्यता का पवित्र रूप होने के साथ ही सामाजिक व्यवस्था का अध्ययन करने की विषय वस्तु भी है। एक वृद्धा के पौत्र का जीवन बचाने के लिए यहां की चारों खामों की विभिन्न जातियों के लोग आपस में किस प्रकार खून बहाते हैं। यह सामाजिक सद्भाव के नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण है। क्षेत्र में रहने वाली विभिन्न जातियों में से चार प्रमुख खाम चम्याल, वालिक, गहरवाल और लमगड़िया खाम के लोग पूर्णिमा के दिन पूजा अर्चना कर एक दूसरे को बग्वाल का निमंत्रण देते हैं। माना जाता है कि पूर्व में यहां नरबलि देने की परंपरा थी, लेकिन जब चम्याल खाम की वृद्धा के एकमात्र पौत्र की बलि के लिए बारी आई तो वंशनाश के डर से उसने मां वाराही की तपस्या की। माता के प्रसन्न होने पर वृद्धा की सलाह पर चारों खामों के मुखियाओं ने आपस में युद्ध कर एक मानव बलि के बराबर रक्त बहाकर कर पूजा करने की बात स्वीकार ली। तभी से ही बग्वाल का सिलसिला चला आ रहा है। बग्वाल में भाग लेने के लिए रणबांकुरों को विशेष तैयारियां करनी होती हैं, जिसमें एक पखवाड़े पूर्व से ही खान-पान संबंधी स्वच्छता बरतनी पड़ती है।

आषाढ़ी कौतिक के नाम से भी प्रसिद्ध है बग्वाल

चम्पावत। अतीत से ही आषाढ़ी कौतिक के नाम से प्रसिद्ध बग्वाल को देखने प्रतिवर्ष देश-विदेश के हजारों पर्यटक और श्रद्धालु देवीधुरा पहुंचते हैं। मेला अवधि में क्षेत्र की लोक कलाओं के प्रदर्शन के अलावा धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन भी चरम पर रहता है। इतिहासकार देवेंद्र ओली के अनुसार बग्वाल स्वच्छ कपड़े पहनकर लाठी और रिंगाल की बनी ढाल के फर्रे से खेली जाती है। सुरक्षा के लिए मैदान में फर्रो और लाठियों को सटाकर कवच बनाया जाता है। स्वयं को बचाकर दूसरे दल के फेंके गए पत्थर अथवा फल और फूल को दोबारा से दूसरी तरफ फेंकना ही बग्वाल कहलाता है।

Gaurav Kala

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